विकास या आदिवासियों का दमन? केन-बेतवा परियोजना में 8 करोड़ का ‘फर्जी मुआवजा’ घोटाला, हक के लिए चिता पर लेटे आदिवासी!

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले से एक ऐसी दिल दहला देने वाली तस्वीर सामने आई है, जिसने सूबे की प्रशासनिक व्यवस्था और मानवीय संवेदनाओं को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

छतरपुर (मध्य प्रदेश)।**

जल-जंगल-जमीन के असली हकदार आदिवासी समाज के लोग अपने अस्तित्व और अधिकारों की रक्षा के लिए जलती चिता की तर्ज पर लकड़ियों (चिता) पर लेटकर ‘जल-सत्याग्रह’ करने को मजबूर हैं। विस्थापन का दंश झेल रहे इन आदिवासियों का आरोप है कि ‘केन-बेतवा लिंक परियोजना’ के नाम पर न केवल उनके आशियाने उजाड़े जा रहे हैं, बल्कि उनके हक के करोड़ों रुपये के मुआवजे की राशि पर भी भ्रष्टाचार का ‘डाका’ डाला गया है। इस पूरे मामले को लेकर अब विपक्ष ने भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

खरिहानी गांव’ बना महा-घोटाले का केंद्र: 11 करोड़ में से 8 करोड़ का फर्जीवाड़ा!

इस पूरे आंदोलन और आक्रोश के केंद्र में केन-बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित होने वाला खरिहानी गांव’ है। इस गांव के विस्थापितों के लिए प्रशासन द्वारा कुल 11 करोड़ रुपये का मुआवजा** आवंटित किया गया था। लेकिन, जमीन पर जो सच सामने आया है, वह चौंकाने वाला है। गंभीर आरोप है कि इस 11 करोड़ रुपये की कुल राशि में से करीब 8 करोड़ रुपये ऐसे ‘फर्जी’ लोगों के बैंक खातों में ट्रांसफर कर दिए गए, जिनका वास्तविक रूप से न तो उस गांव से कोई संबंध है और न ही वहां कोई जमीन थी! असली हकदार आदिवासी आज भी पाई-पाई के लिए मोहताज होकर न्याय की भीख मांग रहे हैं, जबकि मुआवजे की मलाई बाहरी लोग खा गए।

प्रशासन और रसूखदारों की साठगांठ पर गंभीर सवाल?

इतनी बड़ी और खुली वित्तीय अनियमितता आखिर जिला प्रशासन और भू-अर्जन विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की नजर से कैसे बच गई? यह एक ऐसा सनसनीखेज सवाल है जो छतरपुर जिला प्रशासन और राजस्व अधिकारियों की भूमिका को पूरी तरह संदिग्ध बनाता है। स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि बिना किसी बड़ी प्रशासनिक साठगांठ और अधिकारियों की मिलीभगत के करोड़ों रुपये का मुआवजा बाहरी लोगों को बांटा जाना मुमकिन ही नहीं है। यह सीधे तौर पर आदिवासियों के अधिकारों का हनन और सरकारी खजाने की खुली लूट है।

विकास का फ़र्ज़ी मुखौटा पहनना पाप है” — विपक्ष का तीखा हमला

इस गंभीर मुद्दे को लेकर राजनीतिक गलियारों में भी उबाल आ गया है। विपक्षी दलों और आदिवासी अधिकार संगठनों ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। विपक्ष का कहना है कि जल-जंगल-जमीन के असली संरक्षकों को उजाड़कर और फर्जी लोगों को करोड़ों का मुआवजा बांटकर इसे ‘विकास’ का नाम देना एक बड़ा सामाजिक पाप है। चिता पर लेटे आदिवासियों की चीखें और उनका दर्द साफ बयां कर रहा है कि व्यवस्था किस कदर असंवेदनशील हो चुकी है।

न्यायिक जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग

छतरपुर के इस आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में तनाव और आक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा है। आदिवासियों और विपक्ष ने एकजुट होकर एक ही सुर में नारा बुलंद किया है— हमें फर्जी विकास का मुखौटा नहीं, हमारा वास्तविक हक और इंसाफ चाहिए!” मांग की जा रही है कि पूरे मुआवजा वितरण की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच कराई जाए, फर्जी दस्तावेज बनाकर 8 करोड़ हड़पने वाले रसूखदारों को जेल भेजा जाए और प्रभावित आदिवासियों को उनका पूरा हक सम्मान सहित वापस दिलाया जाए।

सुंदरलाल बर्मनhttps://majholidarpan.com/
Sundar Lal barman (41 years) is the editor of MajholiDarpan.com. He has approximately 10 years of experience in the publishing and newspaper business and has been a part of the organization for the same number of years. He is responsible for our long-term vision and monitoring our Company’s performance and devising the overall business plans. Under his Dynamic leadership with a clear future vision, the company has progressed to become one of Hindi e-newspaper , with Jabalpur district.

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