मध्य प्रदेश सरकार द्वारा जल स्रोतों के पुनरुद्धार के लिए चलाया जा रहा महत्वाकांक्षी जल गंगा संवर्धन अभियान’ मझौली नगर परिषद में केवल सरकारी फाइलों और कागजी घोड़ों तक सीमित रह गया है।
मझौली/ जबलपुर
धरातल पर स्थिति यह है कि नगर की प्राचीन बावलियाँ और कुएं आज भी अपनी बदहाली पर आँसू बहा रहे हैं।
भीषण गर्मी के इस दौर में जहाँ जल संरक्षण और संचयन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी थी, वहीं मझौली नगर परिषद ने इस अभियान को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि नगर के सार्वजनिक कुओं और ऐतिहासिक बावलियों में गंदगी का अंबार लगा हुआ है। अभियान की शुरुआत हुए कई दिन बीत जाने के बाद भी अब तक एक भी जल स्रोत की ढंग से साफ-सफाई नहीं कराई गई है।
उल्लेखनीय है कि प्रदेश सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि स्थानीय निकाय पुराने जल स्रोतों को चिन्हित कर उनका गहरीकरण और स्वच्छता सुनिश्चित करें। लेकिन मझौली में प्रशासनिक उदासीनता के चलते:
बावलियों में भरा कचरा: नगर की प्राचीन बावलियां कूड़ादान बन चुकी हैं।
कुओं का अस्तित्व खतरे में: देखरेख के अभाव में कुएं गंदगी और सिल्ट से पट चुके हैं।
सिर्फ फोटोबाजी:आरोप है कि अधिकारी केवल औपचारिकता निभाने के लिए चुनिंदा जगहों पर फोटो खिंचवाकर अभियान की इतिश्री कर रहे हैं।
नगर के प्रबुद्ध नागरिकों का कहना है कि एक ओर जल संकट गहरा रहा है, वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक जल स्रोतों की इस तरह अनदेखी भविष्य के लिए खतरनाक है। यदि समय रहते इन बावलियों और कुओं को पुनर्जीवित नहीं किया गया, तो आने वाले समय में नगर को भारी जल संकट का सामना करना पड़ेगा।
“सरकार करोड़ों खर्च कर रही है, लेकिन परिषद की लापरवाही से योजना का लाभ जनता को नहीं मिल पा रहा है। आखिर कब कागजों से बाहर निकलकर जमीन पर काम होगा?” स्थानीय नागरिक




