मध्य प्रदेश में ‘स्कूल चलें हम’ के नारों के बीच शिक्षा विभाग की एक ऐसी कड़वी सच्चाई सामने आई है, जिसने भविष्य गढ़ने वाली व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं
भोपाल
CAG की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में करीब 1900 स्कूल ऐसे हैं जहाँ छात्रों के सिर पर किसी शिक्षक का साया नहीं है।
CAG की रिपोर्ट (Human Resource Management in Schools of MP) में स्कूलों के श्रेणीवार आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं:
प्राथमिक स्कूल (Primary Schools):1,379
मिडिल स्कूल (Middle Schools):479
सेकेंडरी स्कूल (Secondary Schools):28
हायर सेकेंडरी स्कूल (Higher Secondary Schools): 09
कुल प्रभावित स्कूल: 1,895
अजीब विरोधाभास: कहीं छात्र नहीं तो कहीं शिक्षक नहीं
रिपोर्ट में न केवल शिक्षकों की कमी, बल्कि विभाग के कुप्रबंधन को भी उजागर किया गया है।
1. बिना छात्रों के स्कूल:एक तरफ जहाँ 1,895 स्कूल शिक्षकों का इंतज़ार कर रहे हैं, वहीं 435 स्कूल ऐसे भी पाए गए जहाँ एक भी छात्र नहीं है फिर भी वहाँ शिक्षकों की तैनाती बनी हुई है।
2. अनुपात में असंतुलन: शहरी इलाकों के स्कूलों में शिक्षकों के 91% पद भरे हुए हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा महज 70% है
रिपोर्ट में बताया गया है कि जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET) की हालत भी खस्ता है। यहाँ लेक्चरर के 57% और सहायक प्राध्यापकों के 80% पद खाली पड़े हैं। जब शिक्षकों को ट्रेनिंग देने वाले ही नहीं होंगे, तो शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार कैसे होगा?
CAG ने टिप्पणी की है कि राज्य सरकार स्कूलों के युक्तिकरण (Rationalization) में विफल रही है। लगभग 7,000 ऐसे स्कूल हैं जहाँ छात्रों की संख्या 20 से कम है, लेकिन वहाँ भारी संख्या में शिक्षक तैनात हैं। यदि इन शिक्षकों को उन 1,895 स्कूलों में भेजा जाता जहाँ शिक्षक शून्य हैं, तो स्थिति काफी बेहतर हो सकती थी।
जांच में यह भी पाया गया कि कई जिलों में जिला शिक्षा अधिकारियों (DEO) और ब्लॉक शिक्षा अधिकारियों (BEO) ने सालों से स्कूलों का निरीक्षण तक नहीं किया है। बिना मॉनिटरिंग के चल रहे इन स्कूलों में बच्चों का भविष्य अंधकार में है।
बड़ा सवाल: क्या कागजों पर करोड़ों का बजट और आधुनिक शिक्षा के दावे जमीनी हकीकत से इतने दूर हैं? अब देखना यह है कि इस रिपोर्ट के आने के बाद सरकार क्या सुधारात्मक कदम उठाती है।




