नियमों को ठेंगे पर रखकर मुनाफा कमाने की हवस जब चरम पर पहुंच जाए, तो बस्तियां कैसे ‘नरक’ बन जाती हैं, इसका जीता-जागता उदाहरण जबलपुर जिले की मझौली तहसील का ग्राम रोरा है।
मझौली, जबलपुर (मध्य प्रदेश)
यहाँ ‘हुकुमचंद लाइमस्टोन’ कंपनी की खदान ने न सिर्फ सरकारी नियमों की धज्जियां उड़ाई हैं, बल्कि स्थानीय ग्रामीणों और राहगीरों के जीवन को भी सीधे मौत के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।
जबलपुर और कटनी जिले की सीमा को जोड़ने वाले मुख्य नयागांव-रोसरा मार्ग की सूरत आज इस माइनिंग कंपनी की वजह से पूरी तरह बिगड़ चुकी है। यहाँ सड़क बची ही नहीं है, बचे हैं तो सिर्फ जानलेवा गड्ढे और उड़ता हुआ डस्ट का गुबार।
सड़क के उड़े परखच्चे: 40 साल की मेहनत पर चला कंपनी का बुलडोजर
स्थानीय ग्रामीणों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। ग्राउंड जीरो से आ रही रिपोर्टों के मुताबिक, हुकुमचंद लाइमस्टोन कंपनी द्वारा दिन-रात बेखौफ दौड़ाए जा रहे ओवरलोड भारी वाहनों (Hyva/Trucks) ने ग्राम पंचायत की चमचमाती मुख्य सड़क का नामोनिशान मिटा दिया है। स्थिति इतनी बदतर हो चुकी है कि इस मार्ग पर पैदल चलना या मोटरसाइकिल निकालना भी किसी बड़े हादसे को दावत देने जैसा है। सबसे ज्यादा परेशानी बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और स्कूली बच्चों को हो रही है, जिनका घर से निकलना मुहाल हो गया है।
हैरान और विचलित करने वाली बात यह है कि साल 1984 में जब यह माइंस सैंक्शन हुई थी, तब यह पूरा इलाका एक बंजर मैदान हुआ करता था। पिछले 40 सालों में ग्रामवासियों ने अपनी खून-पसीने की मेहनत से यहाँ एक-एक पौधे को सींचा, पेड़ों को बचाया और एक घना, लहलहाता जंगल खड़ा किया। लेकिन आज मुनाफाखोरी के चक्कर में इस माइनिंग कंपनी द्वारा उन हरे-भरे, फलदार और औषधीय पेड़ों को बेरहमी से उखाड़कर फेंका जा रहा है। पर्यावरण संरक्षण के खोखले दावों के बीच यह प्रकृति की छाती पर सीधा प्रहार है।
गंभीर लापरवाही: बिना फेंसिंग के 60 फीट गहरे ‘डेथ ट्रैप’
इस पूरे मामले का सबसे खौफनाक पहलू सुरक्षा मानकों की अनदेखी है। कंपनी द्वारा माइनिंग एक्ट के नियमों को ताक पर रखकर करीब 50 से 60 फीट गहरे और चौड़े गड्ढे खोदकर खुले छोड़ दिए गए हैं।
सबसे बड़ा खतरा: नियमतः माइनिंग एरिया के चारों तरफ मजबूत बाउंड्री वॉल या कंटीली फेंसिंग (Tar Fencing) होना अनिवार्य है। लेकिन यहाँ सुरक्षा के नाम पर एक ईंट तक नहीं रखी गई है। ये खुले हुए मौत के कुएं किसी भी वक्त मासूम बच्चों, ग्रामीणों या मवेशियों को लील सकते हैं। क्या प्रशासन यहाँ किसी बड़ी मानवीय त्रासदी या मासूमों की मौत का इंतजार कर रहा है?
सिस्टम की खामोशी पर तीखे सवाल:
इस रिपोर्ट के जरिए न्यूज़ नेटवर्क प्रशासन, खनिज विभाग और आरटीओ (RTO) से कुछ सीधे और तीखे सवाल पूछता है:
सवाल 1: जब ओवरलोड गाड़ियां खुलेआम ग्राम पंचायत की सड़कों को मटियामेट कर रही हैं, तो खनिज विभाग और आरटीओ विभाग कुंभकर्णी नींद क्यों सोया हुआ है? इन पर कार्रवाई से किसके हाथ बंध रहे हैं?
सवाल 2: बिना बाउंड्री वॉल और बिना सुरक्षा घेरे के इतनी गहरी खदानें संचालित करने की अनुमति किसने और कैसे दी? क्या अधिकारियों को ग्रामीणों की जान की कोई कीमत नहीं दिखती?
सवाल 3: ग्रामीणों द्वारा 40 वर्षों की मेहनत से तैयार किए गए पर्यावरण और जंगल को उजाड़ने का कानूनी या नैतिक अधिकार इस कंपनी को किसने दिया
ग्राम रोसरा और आसपास के दर्जनों गांवों के लोगों में अब इस तानाशाही के खिलाफ भारी आक्रोश भड़क चुका है। ग्रामीणों ने स्पष्ट शब्दों में जिला प्रशासन और माइनिंग कंपनी को चेतावनी दी है कि यदि:
1. ओवरलोड वाहनों के प्रवेश पर तुरंत रोक नहीं लगी,
2. क्षतिग्रस्त मुख्य मार्ग की अविलंब मरम्मत नहीं कराई गई, और
3. खदानों के चारों तरफ पक्की बाउंड्री वॉल या सुरक्षा घेरा नहीं बनाया गया…
तो आने वाले दिनों में चक्काजाम, तालाबंदी और एक उग्र जन-आंदोलन होगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी।