पीड़ित से अभद्र व्यवहार करने और FIR न लिखने पर सर्वोच्च न्यायालय सख्त
– जस्टिस पंकज मित्थल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने सुनाया युगांतरकारी फैसला
– आरटीआई कार्यकर्ताओं ने फैसले को बताया ‘गेम चेंजर’, पुलिस की मनमानी पर लगेगी लगाम
नई दिल्ली / कानूनी संवाददाता।
देश की सर्वोच्च अदालत ने पुलिसिया कार्यप्रणाली और नागरिकों के मौलिक अधिकारों को लेकर एक बेहद ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि यदि किसी शिकायत में संज्ञेय (Cognizable) अपराध का जिक्र है, तो प्राथमिकी (FIR) दर्ज करना पुलिस की कानूनी ड्यूटी है, कोई एहसान नहीं। कोर्ट ने कहा कि FIR दर्ज करने से मना करना और पीड़ित के साथ अभद्र व्यवहार करना सीधे तौर पर संविधान के आर्टिकल 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत मिले मूल अधिकारों का हनन है।
यह ऐतिहासिक आदेश विनोद कुमार पांडे बनाम सीश राम सैनी व अन्य’ (Vinod Kumar Pandey & Anr. v. Seesh Ram Saini & Ors. – SLP (C) No. 7900 of 2019) के मामले में सुनवाई करते हुए जस्टिस पंकज मित्थल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ द्वारा जारी किया गया है।
क्या था पूरा मामला?
एक पीड़ित व्यक्ति पुलिस थाने में शिकायत लेकर गया था, जहां पुलिस ने न सिर्फ उसकी FIR दर्ज करने से साफ इनकार कर दिया, बल्कि उसके साथ अभद्र और अपमानजनक भाषा का प्रयोग भी किया। पुलिस के इस रवैये के खिलाफ पीड़ित ने न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले की 4 बड़ी बातें:
1. FIR दर्ज करना अनिवार्य: शिकायत में गंभीर या संज्ञेय अपराध का मामला बनते ही पुलिस को तुरंत FIR लिखनी होगी। इसमें किसी भी तरह की आनाकानी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
2. अभद्र व्यवहार = मानवाधिकार उल्लंघन: थाने में आने वाले फरियादियों के साथ बदतमीजी या अभद्र भाषा का इस्तेमाल नागरिक के मूल अधिकारों पर हमला माना जाएगा।
3. जेब से भरा जाएगा मुआवजा: सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित को 2 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह राशि सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि दोषी पुलिसकर्मियों की तनख्वाह (Salary) से वसूली जाएगी।
4. विभागीय जांच के आदेश: लापरवाही बरतने और कानून का उल्लंघन करने वाले संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक एवं विभागीय कार्रवाई (Disciplinary Action) की जाएगी।
“FIR दर्ज करने से इनकार करना महज एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं है, बल्कि यह देश के नागरिक के संवैधानिक और मूल अधिकारों पर सीधा प्रहार है।”
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया
आरटीआई कार्यकर्ताओं ने फैसले का स्वागत किया, बताया ‘गेम-चेंजर’
इस फैसले पर ‘आरटीआई एक्टिविस्ट इंडिया’ के विशेषज्ञ व आरटीआई कार्यकर्ता श्री विनय जी डेविड ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह निर्णय देश में कानून के राज को और मजबूत करेगा।
“पिछले दो दशकों से आरटीआई कार्यकर्ताओं और आम जनता की सबसे बड़ी शिकायत यही रही है कि थानों में गरीबों और पीड़ितों की सुनवाई नहीं होती और FIR दर्ज नहीं की जाती। सुप्रीम कोर्ट ने अब यह साफ कर दिया है कि पुलिस की मनमानी का हर्जाना खुद पुलिस वाले को भुगतना होगा। इससे महकमे में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी। अब कोई भी लोक सूचना अधिकारी (PIO) आरटीआई के तहत मांगी गई FIR की कॉपी देने से मना नहीं कर पाएगा।”
>विनय जी डेविड (एक्सपर्ट, आरटीआई एक्टिविस्ट इंडिया)
नागरिकों के लिए विशेषज्ञ की सलाह:
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि भविष्य में कोई भी पुलिस अधिकारी आपकी जायज शिकायत पर FIR लिखने से मना करता है या अभद्र व्यवहार करता है, तो नागरिक उसका वीडियो साक्ष्य बना सकते हैं और इस फैसले का हवाला देते हुए CRPC/BNSS (156/3) के तहत सीधे अदालत (मैजिस्ट्रेट) की शरण ले सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला अब देश के हर नागरिक का सुरक्षा कवच बनेगा।