खेती कागजों पर नहीं, मिट्टी की तासीर से चलती है।
भोपाल
लेकिन वर्तमान में लागू ई-टोकन और पोर्टल आधारित खाद वितरण प्रणाली ने अन्नदाता को खाद के लिए मोहताज बना दिया है। खरीफ सीजन चरम पर है, लेकिन ‘डिजिटल रसद’ की मेहरबानी देखिए—एक किसान जिसके पास 20 एकड़ की जोत है, उसे सिस्टम ने महज 9 बोरी यूरिया और कुछ बोरी पोटाश थमा दिया, जबकि फसल की जान कहे जाने वाले DAP और ज़िंक का कोटा ‘शून्य’ कर दिया गया है।
किसानों का आरोप है कि सरकार ने एक ऐसी नीति थोप दी है जो “One Size Fits All” (एक ही लाठी से सबको हांकना) के सिद्धांत पर काम कर रही है।
हकीकत: हर खेत की मिट्टी अलग होती है। किसी को फास्फोरस चाहिए, तो किसी को नाइट्रोजन।
सिस्टम की मार: पोर्टल यह तय कर रहा है कि किसान को क्या डालना है। स्टॉक में खाद उपलब्ध होने के बावजूद, ई-टोकन मशीनें अंगूठा लगाने पर वही खाद दे रही हैं जो सिस्टम ने ‘फिक्स’ कर दी है।
जमीनी पड़ताल में यह बात सामने आई है कि गोदामों में खाद के कट्टे रखे हुए हैं, लेकिन वितरण केंद्रों पर बैठे कर्मचारी लाचार हैं। उनका कहना है कि “जब तक पोर्टल पर अलॉटमेंट नहीं दिखेगा, हम खाद नहीं दे सकते।”यह स्थिति उस समय है जब खरीफ की फसल को पोषण की सबसे ज्यादा ज़रूरत है। समय पर खाद न मिलने से फसल का उत्पादन गिरना तय है।
क्या अब एयरकंडीशन कमरों में बैठे लोग तय करेंगे कि मेरी मिट्टी को क्या चाहिए? हमारे पास ज़मीन है, अनुभव है, लेकिन सिस्टम हमें मजबूर बना रहा है।” — एक व्यथित किसान।
एक तरफ सरकार डिजिटल इंडिया और पारदर्शी वितरण का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं दूसरी तरफ किसान लाइनों में लगकर खाली हाथ लौट रहा है। फोटो और प्रचार से खेत की उर्वरता नहीं बढ़ती; उसे सही समय पर सही अनुपात में पोषण चाहिए।
आज किसान सरकार से सीधे सवाल कर रहा है:
1. क्या सरकार को अपने किसान के अनुभव पर भरोसा है या सिर्फ एक एल्गोरिदम पर?
2. अगर सिस्टम की गलती से उत्पादन घटा और किसान कर्ज के बोझ तले दबा, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
3. खाद की कालाबाजारी रोकने के नाम पर क्या असली किसानों का गला घोंटा जा रहा है?
यदि समय रहते इस ई-टोकन प्रणाली की विसंगतियों को दूर नहीं किया गया, तो यह न केवल किसान की कमर तोड़ेगा, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा साबित होगा।
किसान की आवाज़ अब सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक गूँज रही है प्रशासन को नींद से जागना होगा।




