जब नेता-अफसरों से सिर्फ वादे मिले, तो ग्रामीणों ने खुद खोद डाला 150 फीट ऊंचा पहाड़; बना रहे रास्ता

“भगवान के भरोसे मत बैठिए, क्या पता भगवान हमारे भरोसे बैठा हो!” फिल्म ‘मांझी द माउंटेन मैन’ का यह मशहूर डायलॉग मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के ग्रामीणों ने सच कर दिखाया है।

बड़वानी

आजादी के दशकों बाद भी जब शासन-प्रशासन से गांव तक सड़क पहुंचाने के नाम पर सिर्फ खोखले वादे मिले, तो ग्रामीणों के सब्र का बांध टूट गया। सिस्टम के आगे हाथ फैलाने के बजाय ग्रामीणों ने खुद ही आत्मनिर्भरता की कमान संभाली और हाथों में कुदाली-फावड़े थामकर 150 फीट ऊंचे पहाड़ का सीना चीरना शुरू कर दिया।

बिहार के गया के रहने वाले ‘माउंट मैन’ दशरथ मांझी की तरह ही, बड़वानी के इन ग्रामीणों का हौसला आज पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है।

नेताओं और अफसरों की बेरुखी ने बनाया ‘माउंटेन मैन’

मिली जानकारी के अनुसार, बड़वानी जिले के इस सुदूर अंचल के ग्रामीणों को मुख्य सड़क तक पहुंचने के लिए एक विशाल पहाड़ को पार करना पड़ता था। प्रसव पीड़ा से तड़पती महिलाएं हों, स्कूल जाने वाले मासूम बच्चे हों या गंभीर रूप से बीमार बुजुर्ग—हर किसी को इस 150 फीट ऊंचे दुर्गम और पथरीले पहाड़ से होकर गुजरना पड़ता था, जिससे कई बार लोगों की जान पर बन आती थी।

ग्रामीणों ने कई बार जनसुनवाई से लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर काटे। हर बार उन्हें सड़क निर्माण का आश्वासन तो मिला, लेकिन जमीन पर एक ईंट तक नहीं रखी गई। आखिरकार, गांव वालों ने खुद ही इस समस्या को हमेशा के लिए दफन करने का फैसला किया।

बिना सरकारी मदद के, जनसहयोग से चल रहा ‘महाअभियान’

सिस्टम की बेरुखी से नाराज ग्रामीणों ने चंदा इकट्ठा किया और अपने स्तर पर औजार खरीदे। आज इस गांव का हर घर इस मुहिम में अपना योगदान दे रहा है।

 हाथों में कुदाली और अटूट हौसला: सुबह होते ही गांव के युवा, बुजुर्ग और महिलाएं पहाड़ पर जुट जाते हैं। तपती धूप और कठिन पत्थरों के बीच इनका हौसला डिगने का नाम नहीं ले रहा है।

 150 फीट ऊंचे पहाड़ को दे रहे चुनौती: ग्रामीण लगातार खुदाई कर पहाड़ के बीचो-बीच से पक्की डगर (रास्ता) निकालने में जुटे हैं, ताकि गाड़ियां और एम्बुलेंस सीधे उनके गांव के मुहाने तक पहुंच सकें।

सिस्टम के मुंह पर करारा तमाचा है यह सामूहिक प्रयास

ग्रामीणों की हुंकार

> “हम कब तक नेताओं के वादों और अफसरों की फाइलों के भरोसे बैठे रहते? हमारे बच्चों का भविष्य और हमारे बीमार अपनों की जिंदगी इस पहाड़ के कारण खतरे में थी। सरकार रास्ता नहीं देगी, तो हम अपना रास्ता खुद बनाएंगे।”

बड़वानी के इन ‘दशरथ मांझियों’ का यह जज्बा न सिर्फ मिसाल है, बल्कि उस सुस्त प्रशासनिक ढर्रे पर एक करारा तमाचा भी है जो फाइलों में तो विकास की गंगा बहाता है, लेकिन हकीकत में ग्रामीण आज भी अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए पहाड़ काटने को मजबूर हैं। अब देखना यह होगा कि सोशल मीडिया और मीडिया में खबर सुर्खियां बनने के बाद क्या सोया हुआ प्रशासन जागता है या ग्रामीण खुद ही इस पहाड़ को झुकाकर दम लेंगे।

सुंदरलाल बर्मनhttps://majholidarpan.com/
Sundar Lal barman (41 years) is the editor of MajholiDarpan.com. He has approximately 10 years of experience in the publishing and newspaper business and has been a part of the organization for the same number of years. He is responsible for our long-term vision and monitoring our Company’s performance and devising the overall business plans. Under his Dynamic leadership with a clear future vision, the company has progressed to become one of Hindi e-newspaper , with Jabalpur district.

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