राजस्व न्यायालय बना ‘औपचारिकता केंद्र’? बिना जांच, बिना हस्ताक्षर और बिना वैध दस्तावेजों के कर दिए गए नामांतरण”

तहसीलदार के 7 नामांतरण आदेश रद्द: बिना जांच, फर्जी दस्तावेज और अधिकार क्षेत्र से बाहर फैसलों पर कलेक्टर का बड़ा प्रहार

जबलपुर

राजस्व मामलों में भारी अनियमितताओं और कानूनी प्रक्रियाओं की खुलेआम अनदेखी का बड़ा मामला सामने आया है। कलेक्टर जबलपुर राघवेन्द्र सिंह ने तहसीलदार अधारताल न्यायालय द्वारा अगस्त 2023 से फरवरी 2024 के बीच पारित किए गए **नामांतरण के सात आदेशों को निरस्त** कर दिया है। जांच में सामने आया कि तत्कालीन तहसीलदार हरिसिंह धुर्वे ने कई मामलों में बिना पर्याप्त जांच, बिना वैध दस्तावेज और यहां तक कि अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर भी आदेश पारित कर दिए।

कलेक्टर न्यायालय ने इन मामलों को “गंभीर प्रक्रियात्मक त्रुटियों” और “राजस्व अधिकारों के दुरुपयोग” का उदाहरण मानते हुए सभी आदेश रद्द कर दिए तथा प्रकरणों को पुनः विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत सुनवाई के लिए वापस तहसीलदार न्यायालय भेज दिया।

बिना जांच, बिना हस्ताक्षर… फिर भी हो गया नामांतरण!

कलेक्टर न्यायालय की पुनरीक्षण जांच में चौंकाने वाली खामियां सामने आईं। कई मामलों में:

* पटवारी और राजस्व निरीक्षक के प्रतिवेदन पर हस्ताक्षर ही नहीं थे।

* शपथ-पत्र बिना नोटरी और बिना गवाह हस्ताक्षर के लगाए गए।

* 50 रुपये के स्टाम्प की जगह 10 रुपये के टिकट पर दस्तावेज पेश किए गए।

* आवेदन शुल्क चालान बाद की तारीख में जमा किया गया।

* आदेश पत्रिकाओं में तारीखों की काट-छांट और ओवरराइटिंग पाई गई।

* कई प्रकरणों में सुनवाई की तारीखें ही दर्ज नहीं थीं।

* एक मामले में तो प्रकरण अधिकार क्षेत्र से बाहर होने के बावजूद तहसीलदार अधारताल ने आदेश पारित कर दिया।

सबसे गंभीर तथ्य यह रहा कि कई मामलों में आवेदन दर्ज होने के पहले की तारीख में सुनवाई दर्शाई गई और कुछ ही दिनों में नामांतरण आदेश पारित कर दिए गए।

 “पुराने दस्तावेजों की फोटो कॉपी पर ही कर दिया फैसला”

ग्राम लक्ष्मीपुर की भूमि से जुड़े एक मामले में तहसीलदार ने 1989 के दस्तावेजों की साधारण छायाप्रति पर नामांतरण आदेश पारित कर दिया, जबकि न तो दस्तावेज सत्यापित थे और न ही नोटरी प्रमाणित। जांच प्रतिवेदन में पटवारी के हस्ताक्षर तक नहीं थे।

एक अन्य मामले में विक्रय पत्र के पंजीयन से पहले ही आवेदन शुल्क का चालान जमा दिखाया गया। वहीं कई प्रकरणों में शपथ-पत्रों पर तारीख, गवाह, नोटरी सील और हस्ताक्षर तक नहीं पाए गए।

मृतक के नाम, पिता के नाम और दस्तावेज सब अलग-अलग

फौती नामांतरण के एक प्रकरण में मृतक के नाम और पिता के नाम में भारी विसंगति सामने आई।

खसरे में दर्ज नाम और मृत्यु प्रमाण पत्र में अंकित नाम अलग-अलग थे। बावजूद इसके तहसीलदार न्यायालय ने बिना सत्यापन नामांतरण आदेश पारित कर दिया।

 वसीयत की जांच तक नहीं, सीधे पोते के नाम जमीन

दक्षिण मिलौनीगंज के एक मामले में 2019 की कथित वसीयत के आधार पर मृतक की भूमि का नामांतरण सीधे पौत्र के नाम कर दिया गया। जांच में सामने आया कि: वसीयतनामे का सत्यापन नहीं हुआ, अन्य वारिसों को सुना नहीं गया,आदेश पत्रिकाओं में व्हाइटनर और ओवरराइटिंग की गई,

 तथा बाद में कार्यवाही दर्शाने के लिए पुरानी तारीखों की आदेशिकाएं तैयार की गईं।

अधिकार क्षेत्र से बाहर भी सुनवाई

सबसे हैरान करने वाला मामला वह रहा जिसमें प्रकरण नायब तहसीलदार गोहलपुर के अधिकार क्षेत्र का था, आवेदन में भी वही उल्लेखित था, लेकिन फिर भी तहसीलदार अधारताल ने सुनवाई कर नामांतरण आदेश पारित कर दिया।

कलेक्टर का सख्त आदेश: रिकॉर्ड यथावत रहें

कलेक्टर राघवेन्द्र सिंह ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि:

* जब तक संबंधित तहसीलदार पुनः सुनवाई कर अंतिम आदेश पारित नहीं करते,

* तब तक राजस्व रिकॉर्ड वर्तमान स्थिति में यथावत रखे जाएं,

 और खसरे के कॉलम नंबर 12 में “न्यायालय कलेक्टर के पुनरीक्षण में पारित आदेश के अधीन” की टीप अंकित की जाए।

कलेक्टर ने यह भी माना कि यदि पुराने भू-स्वामी का नाम पुनः दर्ज किया गया तो संपत्ति के विक्रय की संभावना बढ़ सकती है और मामले और जटिल हो सकते हैं।

सवालों के घेरे में राजस्व व्यवस्था

इन सात मामलों ने राजस्व न्यायालयों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:

 क्या नामांतरण जैसी संवेदनशील प्रक्रिया केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह गई है?

 बिना हस्ताक्षर, बिना सत्यापन और बिना वैध दस्तावेजों के आदेश कैसे पारित हुए?

 क्या राजस्व रिकॉर्ड में हेरफेर का कोई बड़ा खेल चल रहा था?

और सबसे बड़ा सवाल — क्या यह सब केवल लापरवाही थी या सुनियोजित मिलीभगत?

कलेक्टर न्यायालय की यह कार्रवाई राजस्व विभाग में फैली अनियमितताओं पर बड़ा प्रशासनिक प्रहार मानी जा रही है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या इन मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई भी होगी या मामला सिर्फ आदेश निरस्त होने तक ही सीमित रह जाएगा।

सुंदरलाल बर्मनhttps://majholidarpan.com/
Sundar Lal barman (41 years) is the editor of MajholiDarpan.com. He has approximately 10 years of experience in the publishing and newspaper business and has been a part of the organization for the same number of years. He is responsible for our long-term vision and monitoring our Company’s performance and devising the overall business plans. Under his Dynamic leadership with a clear future vision, the company has progressed to become one of Hindi e-newspaper , with Jabalpur district.

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