विकास की भेंट चढ़ी हरियाली: मझौली के मुख्य बाजार से बरगद-नीम गायब; सरकारी योजनाएं केवल कागजों पर, हकीकत ‘शून्य’

सरकार की ‘एक पेड़ माँ के नाम’ और ‘एक बगिया माँ के नाम’ जैसी लुभावनी योजनाएं केवल फाइलों और विज्ञापनों तक सीमित रह गई हैं।

मझौली (मध्य प्रदेश)

मझौली नगर के मुख्य बाजार की तपती सड़कें इस बात का प्रमाण हैं कि जमीनी स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है। विकास की अंधी दौड़ और प्रशासनिक अनदेखी के कारण नगर के हृदय स्थल से नीम और बरगद जैसे विशाल पेड़ पूरी तरह विलुप्त हो चुके हैं।

हाल के दिनों में ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के तहत प्रशासन ने जमकर वाहवाही बटोरी। नेताओं और अधिकारियों ने पौधे हाथ में लेकर फोटो तो खिंचवाए, लेकिन मझौली के मेन मार्केट में आज एक भी छायादार वृक्ष नजर नहीं आता।

 कागजी हरियाली:सरकारी रिकॉर्ड में हजारों पौधे रोपे गए हैं, लेकिन देखरेख के अभाव और भ्रष्टाचार के चलते हकीकत ‘शून्य’ है।

 बाजार में ‘नो ट्री जोन’: मुख्य बाजार और बस स्टैंड क्षेत्र में जहां कभी विशाल पेड़ हुआ करते थे, वहां अब केवल कंक्रीट का जंगल है। राहगीरों के लिए छाया की एक बूंद तक मयस्सर नहीं है।

 दोहन और उपेक्षा: पुराने पेड़ों को बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के काट दिया गया, और नए पौधों को बचाने के लिए कोई ट्री-गार्ड या सिंचाई की व्यवस्था नहीं की गई।

भीषण गर्मी के दौरान जब तापमान आसमान छूता है, तब मझौली के बाजार में खरीदारी करने आए लोगों का हाल बेहाल हो जाता है।

|सरकारी दावा (योजना) | जमीनी हकीकत (मझौली मार्केट) 

एक पेड़ माँ के नाम | मार्केट में एक भी नया पौधा जीवित नहीं। एक बगिया माँ के नाम | हरियाली की जगह अतिक्रमण और कंक्रीट का विस्तार। |

पर्यावरण संरक्षण बजट | बजट खर्च हुआ, लेकिन छाया गायब है। |

नगर के बुजुर्ग श्याम लाल बताते हैं कि पहले मेन मार्केट के बरगद और नीम के नीचे पंचायतें बैठती थीं और मुसाफिर आराम करते थे। आज सरकार की तमाम बड़ी योजनाओं के बावजूद, लोग चिलचिलाती धूप में खड़े रहने को मजबूर हैं।

सरकार कहती है ‘एक पेड़ माँ के नाम’ लगाओ, लेकिन जो सदियों पुराने ‘पुरखों’ के लगाए पेड़ थे, उन्हें तो प्रशासन ने बचा नहीं पाया। अब सड़कों पर छांव नहीं, सिर्फ धुआं और धूल है।”स्थानीय निवासी

मझौली नगर परिषद और स्थानीय प्रशासन से जनता यह सवाल पूछ रही है कि आखिर पौधारोपण के नाम पर आने वाला बजट कहाँ जा रहा है? यदि ‘एक बगिया माँ के नाम’ जैसी योजनाएं सफल हैं, तो मझौली का मुख्य बाजार आज रेगिस्तान की तरह क्यों तप रहा है?

 जब तक योजनाओं को फोटो खिंचवाने के बजाय जिम्मेदारी के साथ जमीन पर नहीं उतारा जाएगा, तब तक मझौली जैसे नगरों से हरियाली इसी तरह गायब होती रहेगी।
सुंदरलाल बर्मनhttps://majholidarpan.com/
Sundar Lal barman (41 years) is the editor of MajholiDarpan.com. He has approximately 10 years of experience in the publishing and newspaper business and has been a part of the organization for the same number of years. He is responsible for our long-term vision and monitoring our Company’s performance and devising the overall business plans. Under his Dynamic leadership with a clear future vision, the company has progressed to become one of Hindi e-newspaper , with Jabalpur district.

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