पुराने खातों की भी जांच जरूरी, कईयों पर पहले से दर्ज हैं एफआईआर
करोड़ों के धान घोटाले की आशंका, प्रशासनिक भूमिका पर गंभीर सवाल
जबलपुर संवाददाता
धान उपार्जन और मिलिंग व्यवस्था में सामने आई गंभीर अनियमितताओं ने प्रशासन की निगरानी प्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। हालिया जांच में दोषी पाए गए कई मिलरों के नाम बदलकर दोबारा सक्रिय होने के मामले ने घोटाले को और गहरा कर दिया है। सूत्रों के अनुसार यह केवल वर्तमान सीजन की गड़बड़ी नहीं, बल्कि पिछले कई वर्षों से संचालित एक संगठित वित्तीय खेल का हिस्सा हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रति मिलर औसतन 3 से 5 हजार क्विंटल धान की अनियमितता मानी जाए, तो मामला कुछ लाख का नहीं बल्कि करोड़ों रुपये के राजस्व नुकसान तक पहुंच सकता है।
पुराने खातों की फॉरेंसिक जांच अनिवार्य
सूत्र बताते हैं कि वर्ष 2022-23 और 2023-24 के मिलिंग रिकॉर्ड की समुचित जांच अब तक नहीं हुई है। जिन फर्मों पर कार्रवाई हुई, उन्हीं से जुड़े परिवारजन और साझेदारों के नाम से नई फर्में पंजीकृत होकर दोबारा काम कर रही हैं। ऐसे में बैंक खातों, जीएसटी रजिस्ट्रेशन, मिल पंजीयन, भुगतान रजिस्टर, स्टॉक रजिस्टर और परिवहन चालानों की क्रॉस-वेरिफिकेशन और फॉरेंसिक ऑडिट की मांग तेज हो गई है।
अधिकारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार समितियों और मिलों का नाम बदलकर पुनः पंजीयन संबंधित विभागों की जानकारी के बिना संभव नहीं है। यदि पहले से दोषी मिलरों को दोबारा अनुमति दी गई, तो सवाल उठता है कि अनुमति किस स्तर से और किन शर्तों पर दी गई? क्या निगरानी तंत्र में जानबूझकर ढील दी गई, या फिर यह संरक्षण का मामला है? जांच हुई तो विभागीय अधिकारियों की भूमिका पर भी परदा उठ सकता है।
अब तक की कार्रवाई, लेकिन क्या काफी है?
हालिया जांच में 13 मिलरों पर कार्रवाई
करीब ₹12.50 लाख से अधिक का जुर्माना
कई मिलरों पर पहले से एफआईआर दर्ज
हजारों क्विंटल धान की गड़बड़ी की आशंका
नाम परिवर्तन के बाद पुनः पंजीयन और संचालन कुछ इस तरह बदले गए नाम
* पाटन: एजे खंडेलवाल → लक्ष्मी नारायण
* पनागर: मां नर्मदा फूड्स → बड़ेरिया एग्रो
* भेड़ाघाट: एलएनडी फूड्स → आर्यवीर फूड्स
* उमरिया-डुंगरिया: मां नर्मदा एग्रो फूड्स → बालाजी एग्रो फूड्स
* पाटन: हस्मानी एंड संस → युवान इंडस्ट्री
बड़ा सवाल—जवाबदेही कब?
अब सवाल यह नहीं कि नाम बदले गए या नहीं, सवाल यह है कि पुराने अपराधों का हिसाब कब होगा? यदि समय रहते पुराने खातों की गहन जांच नहीं हुई, तो धान उपार्जन व्यवस्था में पारदर्शिता केवल कागज़ों तक सीमित रह जाएगी।
जनता और किसान दोनों जवाब चाहते हैं—और इस बार केवल जुर्माना नहीं, कानूनी कार्रवाई और स्थायी ब्लैकलिस्टिंग की मांग उठ रही है।




