देशभर में वोटर लिस्ट के नवीनीकरण और सत्यापन की प्रक्रिया पर उठ रही आपत्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जारी सुनवाई के दौरान कड़ा संदेश सामने आया है।
विशेष रिपोर्ट
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने आधार कार्ड को मतदाता अधिकार से जोड़ने पर गंभीर सवाल उठाए।
आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं!”
पीठ ने साफ कहा कि—आधार एक वैधानिक दस्तावेज है, जिसका उद्देश्य सरकारी योजनाओं का लाभ हर व्यक्ति तक पहुँचाना है… लेकिन यह नागरिकता का निर्णायक सबूत नहीं है।”
अदालत ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई पड़ोसी देश से आया व्यक्ति भारत में मजदूरी कर रहा है और उसे सिर्फ राशन या अन्य कल्याणकारी लाभ के लिए आधार कार्ड मिल गया —तो क्या इसका अर्थ यह है कि **वह मतदाता बन जाएगा?
न्यायालय ने इसे संविधान की भावना और लोकतंत्र की मूल आत्मा के लिए खतरा बताया।
– वोटर लिस्ट में धांधली रोकना आवश्यक
जस्टिस बागची ने राजनीतिक हस्तक्षेपों पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा—“अगर कोई मजबूत राजनीतिक पार्टी
मृत मतदाताओं के नाम से वोट डलवा सकती है,
तो यह लोकतांत्रिक न्याय के खिलाफ है।”
उन्होंने कहा कि इसी कारण ड्राफ़्ट मतदाता सूची जारी की जाती है ताकि—मृत लोगों के नाम हटाए जा सकें
फर्जी और संदिग्ध वोटर्स चिन्हित हों
अंतिम सूची शत-प्रतिशत सही हो
लोकतंत्र की सुरक्षा — अदालत का स्पष्ट संदेश
पीठ ने कहा कि—वोट का अधिकार सिर्फ नागरिक को
आधार योजनाओं के लाभार्थी की पहचान दोनों को एक मान लेना संविधान के खिलाफ
सुप्रीम कोर्ट के इस रुख ने उन राजनीतिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर कड़ा दबाव बना दिया है, जो आधार को नागरिकता और मतदाता पहचान के बराबर स्थापित करने की कोशिशों में लगी थीं।
क्या संकेत है आगे का रास्ता?
विशेषज्ञों के अनुसार:मतदाता प्रमाणन की प्रक्रिया और कड़ी होगी
घुसपैठ डुप्लिकेट वोटर्स और मृत नामों पर सख्त निगरानी
आधार लिंकिंग पर सरकार को स्पष्ट नियम बनाने होंगे
सुप्रीम कोर्ट का यह बयान सिर्फ कानूनी टिप्पणी नहीं बल्कि एक लोकतांत्रिक चेतावनी है —भारत के मतदाता सूची की शुचिता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता से कोई समझौता नहीं होगा




