सरकारी आदेश के तीन साल पूरे, फाइलों में ‘सुरक्षित’ हुआ पत्रकार सुरक्षा कानून!

कड़वा सवाल: राजधानी के एयरकंडीशंड कमरों तक सिमटी सरकार, जमीन पर लड़ रहे मैदानी पत्रकारों की सुध कौन लेगा?

समिति बनी, बैठक हुई और ठंडे बस्ते में चली गई फाइल; 2023 के आदेश पर 2026 में भी अमल का इंतजार

भोपाल।

मध्य प्रदेश में पत्रकार सुरक्षा कानून का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। 25 सितंबर 2023 को जनसंपर्क विभाग द्वारा जारी किए गए उस आदेश को पूरे तीन साल बीत चुके हैं, जिसमें कानून का मसौदा तैयार करने के लिए वरिष्ठ पत्रकार महेश श्रीवास्तव को समिति में नामांकित किया गया था। आदेश जारी हुआ, समिति बनी और 5 अक्टूबर 2023 को औपचारिक बैठक भी हुई। लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस है—मानो सरकार ने पत्रकार को सुरक्षा देने के बजाय कानून की फाइल को ही किसी मजबूत लॉकर में सुरक्षित रख दिया हो।

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और खोजी पत्रकार यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेन्द्र सिंह जादौन ने अपने तीखे व्यंग्य बाणों के जरिए प्रदेश की मोहन यादव सरकार से सीधा सवाल पूछा है कि आखिर कागजों में दर्ज यह कानून धरातल पर कब उतरेगा?

सड़क, पुल और योजनाओं की समय सीमा तय, तो कानून की फाइल पर क्यों नहीं?

विधानसभा में जब भी यह मामला गूंजा, सरकार का रटा-रटाया जवाब यही रहा कि समिति की बैठक हो चुकी है और अन्य राज्यों से जानकारी जुटाई जा रही है। इस पर सवाल खड़ा करते हुए जादौन ने लिखा कि जब सरकार सड़क, पुल, भवन या किसी सरकारी योजना के लिए बकायदा बजट और समय सीमा तय करती है, तो फिर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की सुरक्षा से जुड़ी फाइल के लिए कोई मियाद क्यों तय नहीं होती? आखिर जानकारी जुटाने की यह कसरत कितने वर्षों तक चलती रहेगी?

“मुख्यमंत्री सिर्फ ANI और PTI के न रह जाएं, जमीन की आवाज भी सुनें”

लेख में सत्ता के संवेदनहीन रवैये पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा गया कि सत्ता में बैठे मुखिया को केवल वही खबरें नहीं देखनी चाहिए जो एयरकंडीशंड स्टूडियोज या बड़ी राष्ट्रीय समाचार एजेंसियों (ANI, PTI) से परोसी जाती हैं।

सरकार को उस मैदानी पत्रकार की सुध भी लेनी चाहिए जो—

 * सुदूर गाँव में बैठकर जर्जर स्कूल की गिरती छत की हकीकत उजागर करता है।

 * राशन दुकान में गरीबों का हक छीने जाने पर सवाल खड़े करता है।

 * प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की गैर-मौजूदगी की पोल खोलता है।

 * किसी बाहुबली या भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ दस्तावेज लेकर निडरता से खड़ा होता है।

जमीनी पत्रकार के पास न तो कोई बड़ी कानूनी टीम होती है और न ही सुरक्षा घेरा। उसके पास सिर्फ एक कलम, एक कैमरा और सवाल पूछने का हौसला होता है। ऐसे में पत्रकार सुरक्षा कानून कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि निडर पत्रकारिता के वजूद की बुनियादी शर्त है।

पत्रकार विरोधी नहीं, पर तारीफ करना भी उसका काम नहीं

लेख में स्पष्ट किया गया कि पत्रकार सरकार का विरोधी नहीं होता, लेकिन हुक्मरानों की चारण-वंदना करना भी उसका दायित्व नहीं है। सत्ता से सवाल पूछना अपराध नहीं, बल्कि जीवंत लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।

आदेशों की उम्र भले ही फाइलों में सीमित हो, लेकिन निष्पक्ष पत्रकारिता की जंग पीढ़ियों तक चलती है। आज प्रदेश का हर मैदानी पत्रकार पूछ रहा है कि वर्ष 2023 का आदेश 2026 में किस पायदान पर खड़ा है?

अब प्रेस नोट नहीं, ठोस कार्रवाई और समय सीमा चाहिए

पत्रकार संगठनों का साफ कहना है कि अब महज प्रेस नोट जारी कर मामले को टाला नहीं जा सकता। सरकार को चाहिए कि:

 * धूल खा रही उस समिति को तत्काल सक्रिय करे।

 * समिति की नई बैठक बुलाकर प्राप्त सुझावों को सार्वजनिक किया जाए।

 * कानून लागू करने की एक पारदर्शी समय सीमा घोषित हो।

वरना आने वाले दिनों में यह एक कड़वा मजाक बनकर रह जाएगा कि मध्य प्रदेश में कानून की फाइल तो पूरी तरह सुरक्षित है, लेकिन जमीन पर सच लिखने वाला पत्रकार लगातार असुरक्षित बना हुआ है।

सुंदरलाल बर्मनhttps://majholidarpan.com/
Sundar Lal barman (41 years) is the editor of MajholiDarpan.com. He has approximately 10 years of experience in the publishing and newspaper business and has been a part of the organization for the same number of years. He is responsible for our long-term vision and monitoring our Company’s performance and devising the overall business plans. Under his Dynamic leadership with a clear future vision, the company has progressed to become one of Hindi e-newspaper , with Jabalpur district.

Latest News

Stay Connected

0FansLike
30FollowersFollow
0FollowersFollow
0FollowersFollow
0SubscribersSubscribe

Most View