प्रदेश में धान खरीदी की शुरुआत हुए 13 दिन बीत चुके हैं, लेकिन खरीदी की कछुआ चाल ने किसानों और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है।
भोपाल/जबलपुर
सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर आंकड़ों में साफ नजर आ रहा है। अब तक मात्र **9.5 लाख मीट्रिक टन** धान की खरीदी हो पाई है, जो कुल लक्ष्य का बेहद छोटा हिस्सा है।
सरकार ने इस सीजन में 100 लाख मीट्रिक टन खरीदी का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। लेकिन पिछले 13 दिनों के औसत को देखें, तो खरीदी की रफ्तार बेहद निराशाजनक है:
कुल लक्ष्य:100 लाख मीट्रिक टन 13 दिन की खरीदी:** 9.5 लाख मीट्रिक टन प्रतिदिन औसत खरीदी: लगभग 0.73 लाख मीट्रिक टन अनुमानित समय:यदि यही रफ्तार जारी रही, तो लक्ष्य पूरा करने में 137 से 140 दिन लगेंगे।
आमतौर पर खरीदी का सीजन सीमित समय के लिए होता है। यदि इसी धीमी गति से प्रक्रिया चलती रही, तो सीजन खत्म होने तक आधा लक्ष्य भी पूरा होना मुश्किल है। इसका सीधा असर उन किसानों पर पड़ रहा है जो मंडियों और खरीदी केंद्रों पर अपनी फसल लेकर खड़े हैं।
धीमी रफ्तार के संभावित कारण:
1. बारदाना और परिवहन: कई केंद्रों पर बारदानों की कमी और परिवहन (ट्रांसपोर्टेशन) की सुस्त व्यवस्था।
2. सर्वर और पोर्टल की समस्या: पंजीयन और स्लॉट बुकिंग में तकनीकी खामियों के कारण किसानों को परेशानी।
3. मौसम का मिजाज: बेमौसम बारिश के डर से किसान और केंद्र प्रभारी दोनों ही दबाव में हैं।
खेतों से अनाज मंडी तक पहुँच तो गया है, लेकिन ‘तौल’ के इंतजार में दिन बीत रहे हैं। जानकारों का कहना है कि यदि खरीदी की क्षमता को तत्काल दोगुना या तिगुना नहीं किया गया, तो प्रदेश का बड़ा किसान वर्ग सरकारी लाभ से वंचित रह सकता है या उन्हें औने-पौने दामों पर बिचौलियों को फसल बेचनी पड़ सकती है।
“अगर लक्ष्य 100 लाख मीट्रिक टन है, तो प्रशासन को युद्धस्तर पर केंद्रों की संख्या और तौल की मशीनों में इजाफा करना होगा, वरना 140 दिन का यह अनुमान हकीकत बन सकता है।”




