अफसरों ने पद को बनाया काली कमाई का जरिया: मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के 4 बड़े पैटर्न; लोकायुक्त में 1,063 केस, कन्विक्शन रेट मात्र 0.65%

मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के दावे फाइलों और दावों तक ही सीमित नजर आ रहे हैं

भोपाल

लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू (EOW) के छापों में अफसरों के ठिकानों से अकूत संपत्ति उजागर हो रही है, लेकिन सजा दिलाने के मामले में पूरा सिस्टम बेहद लचर साबित हुआ है।

विधानसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 से अब तक लोकायुक्त संगठन में कुल 1,063 आपराधिक मामले दर्ज हुए, जिनमें 1,379 अधिकारी-कर्मचारी जांच के दायरे में आए। हैरान करने वाली बात यह है कि इनमें से केवल 7 मामलों में ही आरोपियों को सजा (दोषसिद्धि) मिल सकी है—यानी कुल कन्विक्शन रेट मात्र 0.65% रहा।

भ्रष्टाचार के 4 मुख्य पैटर्न: ऐसे की जा रही काली कमाई

लोकायुक्त की हालिया जांचों में विभिन्न विभागों के अफसरों द्वारा पद का दुरुपयोग कर संपत्ति जुटाने के चार प्रमुख तरीके सामने आए हैं:

 * कमीशन व डमी कंपनियों का खेल (बिजली विभाग): बिजली वितरण कंपनी के अधीक्षण यंत्री (SE) शिवराम सोमिल के छापों में करीब 17 करोड़ की अनुपातहीन संपत्ति (वैध आय से 258% अधिक) उजागर हुई। जांच में सामने आया कि रिश्तेदारों के नाम पर डमी फर्में बनाकर सीधे वर्क ऑर्डर और ठेके दिए जा रहे थे।

 * दवा व आपूर्ति में सेंट्रलाइज्ड सिंडिकेट (स्वास्थ्य विभाग): अस्पतालों में केंद्रीय स्तर पर होने वाली दवा और चिकित्सा उपकरण खरीद में चहेती कंपनियों को फायदा पहुंचाकर कमीशनखोरी का तंत्र खड़ा किया गया।

 * रिकॉर्ड में हेरफेर व टैक्स चोरी (नगर निगम/राजस्व): सहायक राजस्व अधिकारी (ARO) जितेंद्र कुमार पांडेय के पास वैध आय से 474% अधिक संपत्ति मिली। मौके पर बहुमंजिला इमारतें होने के बावजूद कागजों में खाली प्लॉट दिखाकर भारी टैक्स चोरी कराई गई और बदले में रिश्वत वसूली गई।

 * बजट व ट्रांसफर-पोस्टिंग का सिंडिकेट (महिला एवं बाल विकास विभाग): पोषण आहार, आंगनवाड़ी मेंटेनेंस बजट में हेरफेर और संभाग स्तर पर सीआर (CR) लिखने व ट्रांसफर-पोस्टिंग में प्रभाव का इस्तेमाल कर काली कमाई जुटाने का पैटर्न मिला।

सजा की रफ्तार इतनी धीमी क्यों?

 * अभियोजन स्वीकृति में देरी: जांच पूरी होने के बावजूद 134 से ज्यादा मामले शासन स्तर पर अभियोजन स्वीकृति (Prosecution Sanction) के इंतजार में लंबित पड़े हैं।

 * लंबी कानूनी प्रक्रिया: ईओडब्ल्यू और लोकायुक्त मामलों के अंतिम फैसले तक पहुंचने में औसतन 10 से 15 साल या उससे भी अधिक समय लग रहा है।

 * साक्ष्यों की कमजोरी: जांच के दौरान ठोस तकनीकी साक्ष्य अदालत में टिक न पाने के कारण कई बड़े आरोपी बरी हो जाते हैं।:

प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक विभागीय अनुमति की जटिल प्रक्रिया खत्म नहीं होगी और भ्रष्ट अधिकारियों को त्वरित अदालती सजा के साथ सिस्टम से बाहर नहीं किया जाएगा, तब तक भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रभावी लगाम लगाना संभव नहीं होगा।

सुंदरलाल बर्मनhttps://majholidarpan.com/
Sundar Lal barman (41 years) is the editor of MajholiDarpan.com. He has approximately 10 years of experience in the publishing and newspaper business and has been a part of the organization for the same number of years. He is responsible for our long-term vision and monitoring our Company’s performance and devising the overall business plans. Under his Dynamic leadership with a clear future vision, the company has progressed to become one of Hindi e-newspaper , with Jabalpur district.

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