प्रशासन और जनता के बीच शिष्टाचार के संबोधनों को लेकर माननीय उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और स्पष्ट फैसला सुनाया है।
जबलपुर/प्रयागराज
कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी राज्य या केंद्र सरकार के अधिकारी, चाहे वह कितने ही वरिष्ठ पद (कलेक्टर, एसपी या कमिश्नर) पर क्यों न बैठे हों, उनके नाम के साथ ‘माननीय’ (Hon’ble) शब्द का प्रयोग नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने याचिका का निराकरण करते हुए प्रोटोकॉल की व्याख्या की और बताया कि ‘माननीय’ संबोधन का अधिकार केवल कुछ विशिष्ट पदों तक सीमित है:
न्यायपालिका: सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीश।
संवैधानिक पद: राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल और मुख्यमंत्री।
*विधायिका: संसद सदस्य (MP) और विधानसभा सदस्य (MLA)।
अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक अधिकारी (IAS, IPS आदि) ‘पब्लिक सर्वेंट’ यानी **लोक सेवक की श्रेणी में आते हैं। उनके पद की गरिमा और प्रोटोकॉल के अनुसार उन्हें ‘श्री’, ‘श्रीमती’ या उनके पद के नाम से संबोधित किया जाना चाहिए, लेकिन उनके लिए ‘माननीय’ शब्द का उपयोग संवैधानिक प्रोटोकॉल के विरुद्ध है।
1. संवैधानिक मर्यादा: कोर्ट ने कहा कि संबोधन के निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन करना अनिवार्य है ताकि संवैधानिक और प्रशासनिक पदों के बीच का अंतर स्पष्ट रहे।
2. याचिका का निराकरण: यह आदेश उस याचिका पर आया है जिसमें मांग की गई थी कि अधिकारियों के लिए भी विशेष सम्मानजनक संबोधनों का नियम तय किया जाए।
3. जनता के लिए संदेश: इस स्पष्टीकरण के बाद अब सरकारी दस्तावेजों, पत्राचार या सार्वजनिक कार्यक्रमों में अधिकारियों के लिए ‘माननीय’ शब्द का उपयोग गलत माना जाएगा।
हाईकोर्ट के इस रुख के बाद प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। जानकारों का मानना है कि इस स्पष्टीकरण से उस सामंती मानसिकता पर चोट पहुंचेगी जहाँ अधिकारियों को जनता का सेवक होने के बजाय ‘शासक’ के रूप में देखा जाता था। अब पत्राचार और स्वागत भाषणों में संबोधन की त्रुटियों को सुधारना होगा।
प्रशासनिक अधिकारी लोक सेवक हैं, वे जनता की सेवा के लिए नियुक्त हैं। ‘माननीय’ विशेषण केवल संवैधानिक गरिमा के पदों के लिए सुरक्षित है।” — विधि विशेषज्ञोंकी राय
>




