नगर परिषद मझौली में पारदर्शिता की उम्मीद लेकर RTI लगाने वाले नागरिकों को सिर्फ “तारीख और टालमटोल” मिल रही है।
मझौली (जबलपुर)।
सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई सीसीटीवी (CCTV) फुटेज की जानकारी को परिषद ने यह कहकर खारिज कर दिया कि डेटा “ऑटो-डिलीट” हो गया है। सवाल यह है कि यदि जवाब समय पर दिया जाता, तो क्या डेटा सुरक्षित नहीं रहता?
मामला: 2023 का आवेदन, 2026 में जवाब!
वार्ड क्रमांक 12 निवासी सुंदर लाल बर्मन ने 30 जनवरी 2023 को एक आरटीआई आवेदन देकर नगर परिषद कार्यालय के भीतर और गलियारों में लगे सीसीटीवी कैमरों की 01/09/2022 से आवेदन दिनांक तक की वीडियो फुटेज मांगी थी।
नियमतः इसका जवाब 30 दिनों के भीतर मिल जाना चाहिए था, लेकिन नगर परिषद ने 27 अप्रैल 2026 (3 साल बाद) पत्र क्रमांक 187 के माध्यम से जवाब दिया कि:”कैमरों में केवल 5 से 7 दिनों की रिकॉर्डिंग रहती है, उसके बाद वह ऑटो-डिलीट हो जाती है। इस कारण रिकॉर्डिंग देना संभव नहीं है।”
गंभीर सवाल: आखिर परिषद छिपा क्या रही है?
नगर परिषद के इस तर्क ने प्रशासनिक हल्कों में हलचल मचा दी है। विशेषज्ञों और ग्रामीणों ने कई तीखे सवाल उठाए हैं:
1. देरी का जिम्मेदार कौन? यदि रिकॉर्डिंग 7 दिन में डिलीट होती है, तो परिषद ने आवेदन मिलने के तुरंत बाद फुटेज सुरक्षित क्यों नहीं किए?
2. तीन साल तक आवेदन क्यों दबा रहा? क्या यह देरी जानबूझकर की गई ताकि “डेटा डिलीट” होने का कानूनी बहाना बनाया जा सके?
3. क्या छिपाना चाहती है परिषद? उस दौरान कार्यालय के भीतर ऐसी कौन सी हलचल या गतिविधियाँ हुई थीं, जिन्हें सार्वजनिक करने से अधिकारी डर रहे हैं?
सूचना का अधिकार अधिनियम कहता है कि यदि जानकारी उपलब्ध नहीं है, तो उसे तत्काल बताया जाए। लेकिन यहाँ 3 साल तक आवेदक को अंधेरे में रखा गया और अंत में ‘तकनीकी खराबी’ का हवाला देकर पल्ला झाड़ लिया गया। यह न केवल आवेदक के अधिकारों का हनन है, बल्कि सरकारी पारदर्शिता पर भी एक बड़ा धब्बा है।
ब्यूरो रिपोर्ट: मझौली दर्पण न्यूज़




