मध्यप्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में एक बड़ा प्रशासनिक और तकनीकी लापरवाही का मामला सामने आया है।
भोपाल/जबलपुर
भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की रिपोर्ट के बाद अब संचालनालय लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा, भोपाल ने प्रदेश के कई जिलों के अधिकारियों को तत्काल जानकारी देने के निर्देश जारी किए हैं।
13 मार्च 2026 को जारी पत्र के अनुसार, भोपाल, जबलपुर, रीवा, उज्जैन सहित कई जिलों के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारियों (CMHO) और सिविल सर्जनों से रेडियोलॉजी मशीनों के लाइसेंस की अद्यतन स्थिति मांगी गई है।
बिना लाइसेंस चल रहीं 16 स्वास्थ्य संस्थानों की एक्स-रे मशीनें CAG की रिपोर्ट (31 मार्च 2022 तक) में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि: कुल 38 स्वास्थ्य संस्थानों की जांच में 16 संस्थानों में एक्स-रे मशीनें बिना वैध लाइसेंस/नवीनीकरण के संचालित पाई गईं कई जगहों पर AERB (परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड) से लाइसेंस के लिए आवेदन तक नहीं किया गया
यह सीधे-सीधे परमाणु ऊर्जा (विकिरण संरक्षण) नियम 2004 का उल्लंघन है
मझौली भी सूची में शामिल रिपोर्ट में सीएचसी मझौली (जबलपुर) का नाम भी सामने आया है, जहां:100 एमए एक्स-रे मशीन का संचालन बिना वैध लाइसेंस/नवीनीकरण के किया जा रहा था यह स्थिति मरीजों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
रक्त भंडारण और ब्लड बैंक में भी गड़बड़ी
20 चयनित CHC में से केवल 2 (मझौली और बदनावर) में ब्लड स्टोरेज यूनिट बदनावर का लाइसेंस 2019 में ही समाप्त ग्वालियर के जया आरोग्य अस्पताल में 5 साल तक बिना लाइसेंस ब्लड बैंक संचालित
यानी स्वास्थ्य सेवाओं में नियमों की खुलेआम अनदेखी
विभाग का जवाब—‘कोई स्पष्ट उत्तर नहीं’ सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि:कई गंभीर आपत्तियों पर विभाग कोई ठोस जवाब नहीं दे पाया हालांकि बाद में शासन ने (नवंबर 2023) में लाइसेंस नवीनीकरण के प्रयासों की बात स्वीकार की।
संचालनालय ने सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि: कंडिका 8.3.1 के तहत रेडियोलॉजी मशीनों के लाइसेंस की अद्यतन जानकारी तुरंत ई-मेल पर भेजें लापरवाही पर तय हो सकती है जवाबदेही
स्वास्थ्य संस्थानों में बिना लाइसेंस रेडियोलॉजी मशीनों का संचालन: मरीजों को रेडिएशन जोखिम में डाल सकता है
जांच की गुणवत्ता और विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है और सबसे अहम—यह कानून का सीधा उल्लंघन है
प्रदेश के स्वास्थ्य ढांचे में यह मामला केवल तकनीकी लापरवाही नहीं, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता का गंभीर उदाहरण है।
जब जीवन रक्षक सेवाएं ही नियमों के खिलाफ चल रही हों, तो आम जनता की सुरक्षा किसके भरोसे?
(मझौली दर्पण न्यूज)
सवाल सिस्टम से है—जवाबदेही तय होगी या फिर फाइलों में दब जाएगा मामला?”




