प्रशासन की लाख सख्ती और हाल ही में हुई ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ जैसी कार्रवाई के दावों के बावजूद, मझौली नगर में अवैध क्लीनिकों का जाल थमने का नाम नहीं ले रहा है।
मझौली (जबलपुर)
नगर की गलियों से लेकर मुख्य मार्गों तक, बिना किसी वैधानिक अनुमति के चल रहे ये दवाखाने न केवल कानून को ठेंगा दिखा रहे हैं, बल्कि आम जनता की सेहत के साथ भी खिलवाड़ कर रहे हैं।
मझौली के बचैया रोड सहित विभिन्न क्षेत्रों में संचालित हो रहे इन क्लीनिकों के पास न तो CMHO (मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी) जबलपुर का स्वीकृति पत्र है और न ही बायो-मेडिकल वेस्ट (कचरा निस्तारण) के लिए कोई उचित प्रबंध।
इन पर उठ रहे हैं सवाल: सुभाष सराफ, कमलेश श्रीवास, ए. विश्वास इन संचालकों द्वारा बेखौफ होकर क्लिनिक संचालित किए जा रहे हैं, जो सीधे तौर पर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
किसी भी क्लिनिक के संचालन के लिए कचरा निस्तारण का प्रमाण पत्र अनिवार्य है। संक्रमित सुइयां, कॉटन और दवाइयों का कचरा अगर खुले में फेंका जाए, तो यह महामारी का कारण बन सकता है। इसके बावजूद, इन केंद्रों पर सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
नगर में चर्चा का विषय यह है कि जब पूर्व में इन पर कार्रवाई की गई, तो फिर ये दोबारा किसके संरक्षण में फल-फूल रहे हैं?
1. अवैध संचालन: बिना डॉक्टरी डिग्री या CMHO के रजिस्ट्रेशन के प्रैक्टिस करना।
2. प्रदूषण:कचरा निस्तारण (Waste Management) की कोई व्यवस्था न होना।
3. प्रशासनिक सुस्ती: कार्रवाई के बाद दोबारा क्लीनिक खुलने पर मॉनिटरिंग का अभाव।
प्रशासन की कार्रवाई महज कागजी खानापूर्ति नजर आ रही है। अगर ठोस एक्शन लिया गया होता, तो बिना अनुमति के ये दवाखाने दोबारा खुलने की हिम्मत नहीं करते।”— स्थानीय नागरिक शिवम
अब देखना यह होगा कि स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन इन रसूखदार ‘झोलाछापों’ पर कब लगाम कसता है, या फिर जनता की जान इसी तरह दांव पर लगी रहेगी।




