मझौली में दम तोड़ती दशहरे की सांस्कृतिक विरासत, पंडालों में हावी हुई ‘लिफाफा संस्कृति’

कभी रंगमंच, लोककला और रामलीला से गूंजती थीं शामें; अब केवल डीजे का शोर, नेताओं के काफिले और फोटो-ऑप तक सिमटे दुर्गा पंडाल

मझौली /जबलपुर 

आस्था, लोक-संस्कृति और सामाजिक समरसता का प्रतीक माना जाने वाला विजयादशमी व शारदीय नवरात्र का महापर्व नगर मझौली में अपनी पहचान खोने की कगार पर है। जिस नगर की फिजाओं में कभी रामलीला के संवाद, पारंपरिक मानस गान, आल्हा-गायन और स्थानीय कलाकारों के रंगारंग नाटक जीवंतता घोलते थे, वहां अब एक अजीबोगरीब सांस्कृतिक सन्नाटा पसर चुका है। इस समृद्ध विरासत को लील लिया है एक नए और बेहद सतही चलन ने—‘लिफाफा संस्कृति’ और सियासी चेहरा चमकाने की अंधी होड़।

पर्व के पावन मंच अब लोकचेतना जगाने के साधन नहीं रहे, बल्कि वे स्थानीय सियासत के शक्ति-प्रदर्शन और नफा-नुकसान तोलने वाले अस्थायी राजनीतिक अखाड़े बनकर रह गए हैं।

मंच सज रहे, लेकिन कला और संवेदना नदारद

नगर के वरिष्ठ नागरिकों और प्रबुद्धजनों के मुताबिक, एक दौर वह था जब दुर्गा उत्सव समितियां महीनों पहले से सांस्कृतिक आयोजनों की रूपरेखा तैयार करती थीं। स्कूल-कॉलेजों के होनहारों और स्थानीय लोक-कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए पूरा मंच मिलता था। पूरा समाज जाति-पांति और वर्ग भेद भुलाकर देर रात तक इन सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का साक्षी बनता था।

आज तस्वीर ठीक इसके उलट है। मंच अब भी सजते हैं, लेकिन उन पर कला की जगह भारी-भरकम साउंड बॉक्सों से निकलता कानफोड़ू आधुनिक संगीत गूंजता है। पारंपरिक भजन, मानस गायन या लोकनाट्य पूरी तरह गायब हो चुके हैं। नगर के अधिकांश पंडाल अब केवल भव्य प्रतिमा स्थापना, चकाचौंध रोशनी और अंत में विसर्जन की औपचारिकता तक ही सीमित रह गए हैं।

जनसेवा या चुनावी निवेश? पंडाल-दर-पंडाल घूमते नेताओं के काफिले

उत्सव के दिनों में नगर की सड़कों पर आम श्रद्धालुओं से ज्यादा जनप्रतिनिधियों, भावी प्रत्याशियों और छुटभैये नेताओं की लक्जरी गाड़ियों के काफिले दौड़ते नजर आते हैं। तयशुदा स्क्रिप्ट की तरह काफिला पंडाल के सामने रुकता है, हाथ जोड़े नेताजी अंदर दाखिल होते हैं, आरती का थाल उठाया जाता है, और फिर आता है मुख्य दृश्य—कैमरे की चमक के बीच समिति पदाधिकारियों के हाथ में एक बंद लिफाफा थमाना।

तस्वीरें खिंचीं, सोशल मीडिया पर लाइव हुआ और काफिला अगले पंडाल की ओर बढ़ गया। इस पूरे घटनाक्रम ने नगर के जागरूक नागरिकों के जहन में कई चुभते सवाल खड़े कर दिए हैं:

 * क्या यह आस्था का सम्मान है या विशुद्ध राजनीतिक निवेश?

 * क्या जनप्रतिनिधि धार्मिक मंचों को वोट बैंक की मंडी और जनसंपर्क का सस्ता साधन मान चुके हैं?

 * क्या समाज के प्रति जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी सिर्फ एक लिफाफे के भीतर कुछ नोट बंद करके खत्म हो जाती है?

इस पतन के लिए केवल राजनेताओं को ही कठघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता; दुर्गा पूजा आयोजन समितियों की कार्यशैली भी गंभीर समीक्षा की मांग करती है। जानकारों का कहना है कि किसी भी सार्थक सांस्कृतिक या सामाजिक कार्यक्रम के आयोजन में मेहनत, अनुशासन और रचनात्मकता लगती है।

समितियों ने अब आसान रास्ता चुन लिया है। नेताओं को मुख्य अतिथि बनाओ, स्वागत में माला पहनाओ, मंच से उनके कसीदे पढ़ो और लिफाफे के जरिए आयोजन का पूरा बजट निकाल लो। इस ‘शॉर्टकट व्यवस्था’ ने न सिर्फ समितियों की स्वायत्तता छीनी है, बल्कि उन युवाओं के हाथों से मंच भी छीन लिया है जो अपनी कला और अभिनय के दम पर समाज को दिशा दे सकते थे।

अतीत की धरोहर बचाने की अंतिम पुकार

नगर के समाजसेवियों का मानना है कि यदि यह सिलसिला यूं ही बेरोकटोक जारी रहा, तो आने वाली पीढ़ी कभी यह जान ही नहीं पाएगी कि मझौली की सांस्कृतिक जड़ें कितनी गहरी थीं। धार्मिक पर्व महज राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन, सेल्फी और आर्थिक सौदेबाजी का अड्डा बनकर रह जाएंगे।

अब समय आ गया है कि नगर मझौली के नागरिक, जागरूक युवा और उत्सव समितियां आत्ममंथन करें। सवाल बड़ा और सीधा है—क्या मझौली अपनी उस गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत को फिर से जिंदा करने का साहस दिखाएगी, या फिर हर साल आस्था के ये पावन मंच यूं ही सियासी काफिलों की धूल और बंद लिफाफों की भेंट चढ़ते रहेंगे?

सुंदरलाल बर्मनhttps://majholidarpan.com/
Sundar Lal barman (41 years) is the editor of MajholiDarpan.com. He has approximately 10 years of experience in the publishing and newspaper business and has been a part of the organization for the same number of years. He is responsible for our long-term vision and monitoring our Company’s performance and devising the overall business plans. Under his Dynamic leadership with a clear future vision, the company has progressed to become one of Hindi e-newspaper , with Jabalpur district.

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