मध्य प्रदेश की सरकार जहाँ एक ओर किसानों को ‘अन्नदाता’ मानकर उनके कल्याण के लिए दिन-रात काम कर रही है, वहीं खंडवा में एक प्रशासनिक अधिकारी के ‘तानाशाही’ रवैये ने सरकार की छवि पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
खंडवा/भोपाल
जनसुनवाई में न्याय की उम्मीद लेकर पहुंचे एक किसान पिता-पुत्र को उस समय सलाखों के पीछे भेज दिया गया, जब उन्होंने अपनी पीड़ा बताते हुए थोड़ा आवेश में बात की।
क्या है पूरा मामला?
मिली जानकारी के अनुसार, खंडवा कलेक्ट्रेट में जनसुनवाई के दौरान एक किसान अपनी समस्या लेकर पहुंचा था। लंबे समय से परेशान किसान ने जब अपनी बात अधिकारी के सामने रखी, तो दुख और हताशा के कारण उसकी आवाज ऊंची हो गई। इसे ‘अनुशासनहीनता’ और ‘शासकीय कार्य में बाधा’ मानते हुए एसडीएम ने तत्काल धारा 151 के तहत प्रतिबंधात्मक कार्रवाई कर किसान को जेल भेज दिया। हद तो तब हो गई जब अपनी जायज मांग रखने वाले अन्नदाता की तुलना ‘गुंडों’ से कर दी गई।
यह घटना सीधे तौर पर प्रशासनिक अधिकारों के दुरुपयोग का मामला नजर आती है। एक तरफ मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार पारदर्शिता और संवेदनशीलता की बात करती है, वहीं खंडवा में सिटी मजिस्ट्रेट और एसडीएम का यह रवैया आम जनता के बीच आक्रोश पैदा कर रहा है।
सरकार किसान हितैषी रही है, लेकिन ऐसे ‘बेलगाम’ अधिकारी अपनी मनमानी से सरकार की बदनामी का कारण बन रहे हैं। सवाल यह उठता है कि अगर जनसुनवाई में भी किसान सुरक्षित नहीं है और उसकी बात नहीं सुनी जा रही, तो वह अपनी गुहार लेकर कहाँ जाए?
प्रदेश के संवेदनशील मुख्यमंत्री से आशा है कि वे इस मामले का संज्ञान लेंगे। किसानों को गुंडा बताने वाले और तानाशाही दिखाने वाले अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए ताकि भविष्य में कोई भी जिम्मेदार पद पर बैठा व्यक्ति अन्नदाता का अपमान करने की हिम्मत न कर सके।




