मध्य प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में इस समय केवल एक ही नाम की चर्चा है— जी.वी. रश्मि (प्रमुख सचिव, महिला एवं बाल विकास विभाग)


भोपाल
एक ऐसे दौर में जहाँ सरकारी मशीनरी और सत्ताधारी दल के कार्यक्रमों के बीच की लकीर धुंधली होती जा रही है, वहां एक महिला आईएएस अधिकारी ने अपनी कलम और व्हाट्सएप मैसेज से उस लकीर को फिर से गहरा कर दिया है।
क्या है पूरा विवाद?
मामला ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को लेकर भाजपा द्वारा आयोजित ‘नारी सम्मेलन’ से जुड़ा है। भोपाल में आयोजित इस विशाल रैली के लिए प्रदेश भर से 20 हजार महिलाओं को जुटाने का लक्ष्य रखा गया था। आमतौर पर ऐसे आयोजनों में भीड़ और बसों की व्यवस्था का जिम्मा जिला कलेक्टरों पर डाल दिया जाता है, लेकिन इस बार कहानी बदल गई।
व्हाट्सएप मैसेज जिसने ‘सिस्टम’ को चौंकाया
वरिष्ठ अधिकारियों के एक ग्रुप (जनसंपर्क फॉर सीनियर ऑफिसर्स) में जी.वी. रश्मि ने स्पष्ट संदेश जारी किया:
भोपाल में होने वाली महिला रैली का जिलों के लिए कोई आधिकारिक वेबकास्टिंग नहीं होगी। कलेक्टरों को लाइव टेलीकास्ट के लिए कोई सभाएं या व्यवस्था करने की जरूरत नहीं है। पार्टी स्तर पर, भाजपा द्वारा व्यवस्था की जा सकती है।”
इस संदेश का सीधा अर्थ था— सरकार और संगठन अलग हैं। कलेक्टरों को पार्टी के शक्ति प्रदर्शन का हिस्सा बनने की आवश्यकता नहीं है।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम: राजनीति बनाम हक
जहाँ एक ओर भाजपा इस अधिनियम के माध्यम से महिलाओं को 33% आरक्षण देने का श्रेय ले रही है, वहीं विपक्ष और जानकार इसे चुनावी मुद्दा बता रहे हैं। 2023 में पारित होने के बावजूद इसे लागू न कर पाना और ओबीसी कोटे की अनुपस्थिति पर हंगामा जारी है। इसी खींचतान के बीच, सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग पर रोक लगाकर रश्मि दीक्षित ने निष्पक्ष कार्यप्रणाली की एक नई मिसाल पेश की है।
मंत्रालय के गलियारों में इस साहस की ‘भूरी-भूरी’ प्रशंसा हो रही है। कांग्रेस नेता सुभाष बोहत सहित कई सामाजिक संगठनों और ‘मानव अधिकार संरक्षण परिषद’ ने इसे कर्तव्यनिष्ठा का उच्चतम उदाहरण बताया है।
जी.वी. रश्मि का यह कदम उन सभी अधिकारियों के लिए एक ‘नजीर’ है जो राजनीतिक दबाव में अपने संवैधानिक कर्तव्यों को भूल जाते हैं। यह संदेश केवल एक निर्देश नहीं, बल्कि लोकतंत्र को जीवित रखने वाली वह छोटी कील’ है, जो व्यवस्था को पटरी से उतरने से बचाती है।




