शासन के कड़े नियमों और पारदर्शिता के दावों के बीच मझौली विकासखंड का शिक्षा विभाग इन दिनों चर्चाओं के घेरे में है।
मझौली जबलपुर
आरोप है कि यहाँ शासकीय नियमों की सरेआम अनदेखी की जा रही है और प्रशासन “फाइल दबाओ” नीति पर काम कर रहा है
मध्यप्रदेश शासन के स्पष्ट प्रावधानों के अनुसार, 26 जनवरी 2001 के बाद यदि किसी कर्मचारी की तीसरी संतान होती है, तो वह शासकीय सेवा के लिए अपात्र माना जाता है। लेकिन मझौली जनशिक्षा केंद्र के अंतर्गत आने वाले कई स्कूलों में ऐसे शिक्षक धड़ल्ले से सेवा दे रहे हैं, जिन पर यह नियम लागू होता है।
हैरानी की बात यह है कि प्रदेश के अन्य जिलों में इसी नियम के तहत बर्खास्तगी और निलंबन जैसी कार्रवाइयां हो रही हैं, लेकिन मझौली में सन्नाटा पसरा है।
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि इन शिक्षकों को राजनीतिक या उच्च अधिकारियों का अभयदान प्राप्त है। जब भी शिकायतों के आधार पर जानकारी मांगी जाती है, तो फाइलें कार्यालयों में ही दम तोड़ देती हैं। सूत्रों का दावा है कि: जांच प्रक्रिया को जानबूझकर लंबा खींचा जाता है।
जानकारी मांगते समय अधूरी या गलत जानकारी पेश की जाती है।
कई शिकायतें वर्षों से धूल खा रही हैं, जिससे पात्र उम्मीदवारों के हक का हनन हो रहा है
जब इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब मांगा गया, तो उनकी प्रतिक्रिया विभाग की कार्यप्रणाली को और अधिक संदिग्ध बनाती है:
जो जानकारी मांगी है वह मैं नहीं दे सकता, आप पहले हमारे डीआईओ (DEO) साहब से परमीशन ले लें, फिर मैं आपको पूरी जानकारी उपलब्ध करा दूंगा।”
अतुल चौधरी, बीईओ विकासखंड मझौली
अधिकारियों के इस ‘टालमटोल’ वाले रवैये से स्पष्ट है कि विभाग जानकारी साझा करने से बच रहा है। आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि स्पष्ट नियमों के बावजूद जांच के नाम पर केवल समय मांगा जा रहा है?
अब क्षेत्र के अभिभावकों और सजग नागरिकों ने मांग की है कि इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच हो। यदि मझौली में नियमों का पालन नहीं हो रहा है, तो इसके लिए जिम्मेदार लिपिकों और अधिकारियों पर भी गाज गिरनी चाहिए ताकि व्यवस्था में पारदर्शिता लौट सके।
कट-ऑफ डेट:26 जनवरी 2001 के बाद तीसरी संतान पर अपात्रता।
आरोप: मझौली जनशिक्षा केंद्र में नियमों की अनदेखी और जानकारी छिपाने का प्रयास।
प्रतिक्रिया: बीईओ मझौली ने जानकारी देने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की अनुमति का हवाला दिया।




