नगर परिषद मझौली में भ्रष्टाचार और तानाशाही का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने सरकारी तंत्र की शुचिता पर कालिख पोत दी है।
मझौली (जबलपुर)
साप्ताहिक हाट-बाजार के नाम पर व्यापारियों से सालाना 18 लाख रुपये की वसूली की जा रही है, लेकिन चौंकाने वाला सच यह है कि नगर परिषद के पास इस बाजार के लिए **न तो कोई वैध जमीन है और न ही कोई कानूनी दस्तावेज।**
सूचना आयोग में खुली पोल: “हमारे पास कोई रिकॉर्ड नहीं”
हाल ही में राज्य सूचना आयोग (जबलपुर बेंच) में हुई सुनवाई (प्रकरण क्र. A-5426) के दौरान नगर परिषद मझौली की पोल खुल गई। अपीलार्थी सुंदर लाल बर्मन द्वारा मांगी गई जानकारी के जवाब में लोक सूचना अधिकारी ने लिखित रूप में स्वीकार किया कि:
नगर परिषद के पास हाट-बाजार के लिए आवंटित शासकीय भूमि का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
कलेक्टर कार्यालय द्वारा बाजार के लिए कोई भूमि आवंटित नहीं की गई है।
पूरा बाजार केवल “पुरानी व्यवस्था” के नाम पर बिना किसी कागजी आधार के चल रहा है।
जब नगर परिषद के पास हाट-बाजार की कोई वैध जमीन ही नहीं है, तो व्यापारियों से लाखों रुपये का टैक्स वसूलना सीधे तौर पर ‘गुंडा वसूली’ की श्रेणी में आता है। व्यापारियों का आरोप है कि:
1. अवैध उगाही: बिना किसी आवंटन आदेश या वैधानिक प्रक्रिया के, परिषद के कर्मचारी व्यापारियों पर दबाव बनाकर वसूली करते हैं।
2. हिसाब में हेराफेरी:सालाना करीब 18 लाख रुपये की आय का कोई पारदर्शी हिसाब जनता के सामने नहीं रखा जा रहा है।
3. सुविधा शून्य:व्यापारियों से पैसे तो वसूले जाते हैं, लेकिन बाजार में न बैठने की जगह है, न पानी और न ही सफाई की व्यवस्था
यह खुलासा साबित करता है कि मझौली नगर परिषद में वर्षों से “कागजों पर गायब” बाजार के नाम पर वसूली का काला खेल चल रहा है। बिना किसी वैध दस्तावेज के वसूली करना न केवल वित्तीय अनियमितता है, बल्कि व्यापारियों के साथ सरेआम धोखाधड़ी है। सवाल यह उठता है कि आखिर यह 18 लाख रुपये किसकी जेब में जा रहे हैं?
सूचना आयोग की कार्यवाही में यह स्पष्ट हो चुका है कि परिषद के पास कोई वैध आधार नहीं है। इसके बावजूद “गुंडा वसूली” का जारी रहना जिला प्रशासन की सतर्कता पर भी सवाल खड़े करता है। जागरूक नागरिकों ने अब इस मामले में दोषियों पर एफ़आईआर (FIR) दर्ज करने और अवैध वसूली को तुरंत रोकने की मांग की है।
“मझौली दर्पण” इस भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी मुहिम जारी रखेगा। जब जमीन ही परिषद की नहीं, तो वसूली का हक किसने दिया?




