संस्कारधानी के विकास का ‘मील का पत्थर’ कहा जाने वाला 7.5 किलोमीटर लंबा फ्लाईओवर ब्रिज अब सवालों के घेरे में है।
जबलपुर
23 अगस्त 2025 को जिस प्रोजेक्ट का बड़े तामझाम के साथ उद्घाटन कर जनता को समर्पित किया गया था, वह अब भ्रष्टाचार के आरोपों की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। ₹1200 करोड़ की भारी-भरकम लागत से बने इस ब्रिज की बदहाली ने प्रशासन और निर्माण एजेंसी की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
करोड़ों खर्च, फिर भी सड़कें बदहाल
दमोह नाका से मदन महल तक फैले इस भव्य फ्लाईओवर का निर्माण शहर की ट्रैफिक व्यवस्था को सुधारने के लिए किया गया था। लेकिन उद्घाटन के महज कुछ ही महीनों के भीतर ब्रिज की सतह पर उभरे गड्ढे और तकनीकी खामियों ने निर्माण की गुणवत्ता की पोल खोल दी है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि इतने कम समय में सड़क का उखड़ना साफ तौर पर घटिया निर्माण सामग्री के उपयोग की ओर इशारा करता है।
जनता की सुरक्षा के साथ खिलवाड़
7 किलोमीटर से अधिक लंबे इस ऊंचे ब्रिज पर हजारों वाहन रोजाना गुजरते हैं। ऐसे में निर्माण में बरती गई लापरवाही किसी बड़े हादसे को न्योता दे सकती है। ₹1200 करोड़ जैसी बड़ी राशि खर्च होने के बाद भी अगर पुल की स्थिति ‘बीमार’ है, तो सवाल उठता है कि आखिर जनता के टैक्स का पैसा किसकी जेब में गया?
सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक, अब इस प्रोजेक्ट की निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और शहर के जागरूक नागरिकों ने मांग की है कि:
निर्माण में इस्तेमाल की गई सामग्री की लैब टेस्टिंग कराई जाए।
दोषी ठेका कंपनियों और निगरानी में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई हो।
जल्द से जल्द इसकी मरम्मत कर इसे सुरक्षित बनाया जाए।
जबलपुर का यह फ्लाईओवर विकास की चमक दिखाने के लिए बनाया गया था, लेकिन वर्तमान स्थिति को देखकर यह भ्रष्टाचार का एक और नमूना नजर आ रहा है। अगर समय रहते इसकी गुणवत्ता और भ्रष्टाचार की जांच नहीं हुई, तो यह न केवल सरकारी खजाने का नुकसान होगा, बल्कि शहरवासियों के लिए एक ‘सफेद हाथी’ साबित होगा।
ब्यूरो रिपोर्ट: जबलपुर




