वर्तमान में जारी चुनावी सरगर्मी के बीच आम आदमी के मन में एक ही सवाल है
नई दिल्ली/जबलपुर
क्या चुनाव खत्म होते ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बड़ा उछाल आएगा? वैश्विक स्तर पर ईरान-इजराइल तनाव और युद्ध के हालातों ने कच्चे तेल के बाजार में तहलका मचा रखा है, जिससे दुनिया भर में ईंधन की कीमतों में **44%** तक की भारी बढ़ोतरी देखी गई है।
ईरान और मध्य-पूर्व में जारी युद्ध की स्थिति ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल (Crude Oil) की सप्लाई चेन को प्रभावित किया है। आंकड़ों की मानें तो:
पाकिस्तान और अमेरिका जैसे देशों में पिछले कुछ महीनों में पेट्रोल की कीमतों में रिकॉर्ड 44% तक का इजाफा हुआ है।
यूरोप के कई देशों में ऊर्जा संकट गहरा गया है और परिवहन लागत बढ़ने से महंगाई चरम पर है।
पूरी दुनिया में ईंधन महंगा होने के बावजूद भारत में कीमतें स्थिर बनी हुई हैं। इसके पीछे दो मुख्य कारण माने जा रहे हैं:
1. रूस के साथ रणनीतिक व्यापार: भारत ने पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद रूस से भारी डिस्काउंट पर कच्चा तेल खरीदना जारी रखा, जिससे घरेलू बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिली।
2. रणनीतिक भंडार और सरकारी हस्तक्षेप: केंद्र सरकार और तेल कंपनियों ने फिलहाल कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है, जिससे जनता को अंतरराष्ट्रीय उतार-चढ़ाव का सीधा असर महसूस नहीं हो रहा।
बाजार विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि चुनाव के दौरान तेल कंपनियां अक्सर कीमतों में बदलाव से बचती हैं। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें जिस तरह से 90 डॉलर प्रति बैरल के पार जा रही हैं, उसे देखते हुए चुनाव के बाद तेल कंपनियां अपना ‘अंडर-रिकवरी’ (घाटा) पूरा करने के लिए कीमतों में 5 से 10 रुपये तक की बढ़ोतरी कर सकती हैं।
यदि पेट्रोल और डीजल महंगा होता है, तो इसका सीधा असर माल ढुलाई पर पड़ेगा, जिससे फल, सब्जियां और अन्य आवश्यक वस्तुओं के दाम भी बढ़ सकते हैं। फिलहाल जनता के लिए राहत की बात यह है कि चुनाव तक कीमतें स्थिर रहने की उम्मीद है, लेकिन ‘पोस्ट-इलेक्शन’ सिनेरियो डराने वाला हो सकता है।




