स्वस्थ होकर भी मरीज बन कराया टेस्ट; रिपोर्ट देख विशेषज्ञ डॉक्टर भी रह गए सन्न

किराये पर एमडी की डिग्रियां: लैब में टेस्टिंग 12वीं पास लड़के करते हैं, साइन डॉक्टर के डिजिटल फॉर्मेट में बिकते हैं

• 40 से 60% कट-प्रैक्टिस का खुला खेल: मरीज रेफर करने पर डॉक्टरों व झोलाछापों को मोटी दलाली

भोपाल/ग्वालियर

यदि आप पूरी तरह तंदुरुस्त हैं, शरीर में किसी प्रकार का कोई लक्षण नहीं है, फिर भी डायग्नोस्टिक रिपोर्ट में आपकी आंतें चिपकी हुई निकल आएं, लिवर डैमेज बता दिया जाए और टाइफाइड पॉजिटिव थमा दिया जाए—तो हैरान मत होइए। मध्य प्रदेश के महानगरों से लेकर कस्बों तक फर्जी पैथोलॉजी लैब्स और कमीशनखोरी का एक ऐसा खतरनाक सिंडिकेट जड़ें जमा चुका है, जहां रिपोर्ट मरीज के स्वास्थ्य मापदंडों से नहीं, बल्कि लैब के मुनाफे और डॉक्टर के कमीशन के हिसाब से प्रिंट की जाती है।

दैनिक भास्कर की विशेष पड़ताल में खुलासा हुआ है कि इस जानलेवा सिंडिकेट की कड़ियां मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) कार्यालय की सांठगांठ और एक रसूखदार सफेदपोश के संरक्षण से जुड़ी हैं। नियमों को ताक पर रखकर पूरे प्रदेश में बिना मान्यता और बिना पैथोलॉजिस्ट के सैकड़ों डमी सेंटर बेधड़क संचालित हो रहे हैं।

जब स्वस्थ रिपोर्टर ‘मरीज’ बनकर लैब पहुंचा

इस फर्जीवाड़े की जमीनी हकीकत परखने के लिए संवाददाता ने खुद को मरीज बनाकर एक सामान्य जांच कराने का फैसला किया। रिपोर्टर पूरी तरह स्वस्थ था और उसे किसी तरह का कोई संक्रमण या लक्षण नहीं था।

 * पहला कदम (सैंपल कलेक्शन): शहर की मुख्य सड़क पर संचालित बिना अधिकृत बोर्ड वाली एक लैब में रिपोर्टर ने पेट में हल्के दर्द का हवाला देकर ब्लड और यूरिन का सैंपल दिया।

 * लैब की हकीकत: लैब में जांच करने वाला युवक महज 12वीं पास निकला। मौके पर कोई भी योग्य पैथोलॉजिस्ट मौजूद नहीं था। एनालाइजर के नाम पर बिना कैलिब्रेशन वाली धूल फांकती पुरानी मशीनें रखी थीं।

 * चौंकाने वाली रिपोर्ट: चार घंटे बाद जो रिपोर्ट थमाई गई, उसने मेडिकल साइंस को शर्मसार कर दिया। रिपोर्ट में लिवर एंजाइम (SGOT/SGPT) खतरनाक स्तर तक बढ़े हुए दिखाए गए, टाइफाइड विडाल टेस्ट पॉजिटिव आया और रिमार्क में आंतों में सूजन व चिपकाव (इंटेस्टाइनल एडिजन) की गंभीर आशंका दर्ज कर दी गई।

 * सत्यापन में खुली पोल: जब उसी दिन उसी रिपोर्टर का ब्लड सैंपल एक अधिकृत मेडिकल कॉलेज और एनएबीएल (NABL) मान्यता प्राप्त प्रतिष्ठित लैब में भेजा गया, तो सभी पैरामीटर्स शत-प्रतिशत सामान्य पाए गए।

किराये की डिग्रियां: ₹20 से ₹50 हजार में बिकते हैं डिजिटल दस्तखत

पड़ताल में सामने आया कि जांच रिपोर्टों पर डॉक्टरों के हस्ताक्षर का खेल पूरी तरह फर्जीवाड़े पर टिका है:

 * कागजी मौजूदगी: नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) और क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट नियमों के अनुसार हर रिपोर्ट का सत्यापन एमडी पैथोलॉजिस्ट की निगरानी में होना अनिवार्य है।

 * 25 से 30 लैब्स पर एक ही डॉक्टर: सिंडिकेट में शामिल एक-एक पैथोलॉजिस्ट के नाम पर 25 से 30 लैब्स पंजीकृत हैं। डॉक्टर कभी लैब की चौखट तक नहीं जाते।

 * सॉफ्टवेयर में बिकते साइन: डॉक्टर के डिजिटल हस्ताक्षर सीधे लैब सॉफ्टवेयर में अपलोड कर दिए जाते हैं। इसके बदले डॉक्टर को घर बैठे ₹20,000 से ₹50,000 प्रति माह की ‘रॉयल्टी’ दी जाती है।

कट-प्रैक्टिस का मायाजाल: 60 फीसदी तक दलाली

यह पूरा नेटवर्क स्वास्थ्य सेवा नहीं, बल्कि कमीशनखोरी की इंडस्ट्री बनकर रह गया है:

 * झोलाछाप से लेकर क्लिनिक तक फिक्स कमीशन: यदि कोई डॉक्टर या ग्रामीण क्षेत्रों का झोलाछाप मरीज को जांच के लिए भेजता है, तो कुल बिल का 40% से 60% हिस्सा तुरंत उसके खाते में या नकद पहुंचा दिया जाता है।

 * फर्जी पैकेज का मकड़जाल: ₹2000 से ₹5000 के ‘फुल बॉडी चेकअप’ पैकेज बेचे जाते हैं, जिनकी वास्तविक रासायनिक लागत ₹300 भी नहीं होती। मनगढ़ंत रिपोर्ट देकर मरीज को भयभीत किया जाता है, ताकि आगे भर्ती और महंगी दवाओं का खेल शुरू किया जा सके।

फर्जीवाड़े का इनसाइड रिपोर्ट कार्ड

| जांच पैमाना | जमीनी हकीकत | नियम क्या कहते हैं

| पैथोलॉजिस्ट की उपस्थिति | सिर्फ सॉफ्टवेयर में डिजिटल साइन, डॉक्टर नदारद | जांच के समय योग्य डॉक्टर की भौतिक मौजूदगी अनिवार्य |

| तकनीशियन की योग्यता | अप्रशिक्षित व 12वीं पास युवा कर रहे टेस्टिंग | DMLT / BMLT डिग्रीधारी अधिकृत लैब तकनीशियन |

| मशीनों की गुणवत्ता | बिना सर्विसिंग व कैलिब्रेशन की पुरानी मशीनें | समय-समय पर NABL मानकों पर क्वालिटी कंट्रोल ऑडिट |

| कमीशन का खेल | 40% से 60% तक रेफरल कट की खुली बंदरबांट | मेडिकल काउंसिल नियमों के तहत कमीशन लेना-देना गैरकानूनी |

सीएमएचओ दफ्तर की बंधी और सफेदपोश का वरदहस्त

अवैध लैब्स पर स्वास्थ्य विभाग की मेहरबानी का कारण जिला स्तर पर बैठा भ्रष्टाचार है। क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत लैब्स के नियमित निरीक्षण और लाइसेंस नवीनीकरण की जिम्मेदारी सीएमएचओ कार्यालय की होती है, लेकिन मैदानी स्तर पर स्थिति यह है कि अवैध लैब्स से तय मासिक वसूली की जाती है।

सूत्रों के मुताबिक, इस गोरखधंधे के पीछे सत्ता से जुड़े एक प्रभावशाली मंत्री के करीबी का हाथ है। स्वास्थ्य अधिकारियों के तबादले और पोस्टिंग की धौंस दिखाकर पूरे अवैध नेटवर्क को अभयदान दिया जाता है। नतीजतन, शिकायतों की फाइलें हमेशा के लिए ठंडे बस्ते में चली जाती हैं।

विशेषज्ञ चेतावनी: गलत रिपोर्ट से जा सकती है जान

वरिष्ठ चिकित्सकों का कहना है कि फर्जी रिपोर्ट के आधार पर यदि किसी स्वस्थ व्यक्ति को टाइफाइड, गंभीर संक्रमण या लिवर संबंधी भारी एंटीबायोटिक्स और स्टेरॉयड दे दिए जाएं, तो उसका स्वस्थ लिवर और किडनी वास्तव में फेल हो सकते हैं। यह केवल धोखाधड़ी नहीं, बल्कि सीधे तौर पर गैर-इरादतन हत्या की श्रेणी में आने वाला अपराध है।

शासन-प्रशासन के सामने अब सीधा सवाल है कि क्या इस सनसनीखेज खुलासे के बाद जिम्मेदार तंत्र जागेगा और किराये पर डिग्रियां बांटने वाले डॉक्टरों, अवैध लैब संचालकों और उन्हें संरक्षण देने वाले अधिकारियों पर एफआईआरदर्ज कर ठोस कानूनी कार्रवाई करेगा?

सुंदरलाल बर्मनhttps://majholidarpan.com/
Sundar Lal barman (41 years) is the editor of MajholiDarpan.com. He has approximately 10 years of experience in the publishing and newspaper business and has been a part of the organization for the same number of years. He is responsible for our long-term vision and monitoring our Company’s performance and devising the overall business plans. Under his Dynamic leadership with a clear future vision, the company has progressed to become one of Hindi e-newspaper , with Jabalpur district.

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