माझी जनजाति आरक्षण विवाद: टीआरआई ने झाड़ा पल्ला, केंद्र द्वारा प्रस्ताव निरस्त होने का दिया हवाला

मध्य प्रदेश में माझी जनजाति के मानवशास्त्रीय अध्ययन व सर्वे में सुधार को लेकर उठ रहे सवालों के बीच जनजातीय अनुसंधान एवं विकास संस्था (TRI), भोपाल ने स्पष्ट किया है कि उसके अध्ययनों में कोई विसंगति नहीं है और संस्था स्तर पर अब कोई कार्यवाही शेष नहीं है।

भोपाल/नरसिंहपुर

नरसिंहपुर निवासी श्री अमरसिंह नौरिया द्वारा माझी जनजाति के सर्वे में सुधार और माझी जनजाति को पुनर्परिभाषित करने को लेकर दिए गए आवेदनों (दिनांक 24.12.2025 व 02.04.2026) के जवाब में टीआरआई के संयुक्त संचालक द्वारा आधिकारिक पत्र जारी किया गया है।

केंद्र ने 2020 में ही खारिज कर दिया था प्रस्ताव

टीआरआई द्वारा जारी पत्र के अनुसार, वर्ष 2017 में राज्य शासन स्तर पर माझी जाति के समकक्ष व पर्यायवाची जातियों के रूप में ढीमर, भोई, केवट आदि को एसटी वर्ग में जोड़ने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित की गई थी। राज्य शासन ने 29 अगस्त 2018 को इस समिति की अनुशंसा रिपोर्ट भारत सरकार को भेजी थी।

भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय ने जब इस प्रस्ताव को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) और भारत के महारजिस्ट्रार (RGI) के पास परीक्षण के लिए भेजा, तो वहां से असहमति प्राप्त हुई। इसके बाद भारत सरकार ने 13 मार्च 2020 को राज्य सरकार के इस प्रस्ताव को पूरी तरह अमान्य कर दिया।

ओबीसी और एसटी जातियों में अंतर स्पष्ट

संस्था के अभिलेखों और अनुसंधान रिपोर्ट के अनुसार, वास्तविक अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग की जातियों का विवरण इस प्रकार है:

 * वास्तविक ‘माझी’ (ST – अनुक्रमांक 29): यह जनजाति मुख्यतः रायगढ़, सरगुजा, बिलासपुर, कोरबा, सीधी आदि जिलों में पाई जाती है। इनका मुख्य पेशा जंगली उपज संग्रह, शिकार, आदिम कृषि और बांस की टोकरी बनाना है। ये मुंडारी भाषा समूह की ‘माझी’ बोली बोलते हैं।

 * व्यावसायिक ‘मांझी’ (OBC – अनुक्रमांक 12): ढीमर, धीवर, केवट, भोई, कहार, रैकवार, बाथम आदि जातियां पिछड़ा वर्ग के अंतर्गत आती हैं। इनका मुख्य व्यवसाय मछली पकड़ना, नाव खेना, पानी भरना और सिंघाड़े की खेती करना है। रिपोर्ट के अनुसार, ये व्यावसायिक रूप से ‘मांझी’ कहलाते हैं, लेकिन अनुसूचित जनजाति के अंतर्गत नहीं आते।

इसके साथ ही रिपोर्ट में भुंजिया-भड़भुंजा और हल्बा/हल्बी-कोष्टा/कोष्टी जातियों के बीच के अंतर का भी उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया गया है कि पात्रता केवल राज्य की संबंधित आरक्षित सूची के आधार पर ही तय होती है। केंद्र से प्रस्ताव खारिज होने और टीआरआई के इस रुख के बाद अब इस मामले में प्रशासनिक स्तर पर गेंद पूरी तरह नीतिगत फैसलों के पाले में चली गई है।

सुंदरलाल बर्मनhttps://majholidarpan.com/
Sundar Lal barman (41 years) is the editor of MajholiDarpan.com. He has approximately 10 years of experience in the publishing and newspaper business and has been a part of the organization for the same number of years. He is responsible for our long-term vision and monitoring our Company’s performance and devising the overall business plans. Under his Dynamic leadership with a clear future vision, the company has progressed to become one of Hindi e-newspaper , with Jabalpur district.

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