सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारियों को घुमाने और टालने के मामले में नगर परिषद मझौली का एक नया कारनामा सामने आया है।
मझौली जबलपुर
परिषद ने एक आरटीआई के जवाब में यह कहकर पल्ला झाड़ लिया है कि उनके यहाँ कोई ‘दैनिक वेतन भोगी’ कर्मचारी ही नहीं है, बल्कि वे ‘सामूहिक श्रमिकों’ से काम चला रहे हैं।
वार्ड क्रमांक 12 के निवासी सुंदर लाल बर्मन ने 15 फरवरी 2023 को एक आरटीआई आवेदन लगाकर नगर परिषद में होने वाली दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों की भर्ती की नियमावली, आयु सीमा और नियुक्त कर्मचारियों के दस्तावेजों की सत्यापित प्रतियाँ मांगी थीं।
इस आवेदन के जवाब में (क्रमांक 186, दिनांक 27/04/2026) नगर परिषद मझौली ने स्पष्ट लिखा है कि:“नगर परिषद मझौली में दैनिक वेतन भोगी के रूप में कोई भर्ती नहीं की गई है। आवश्यकता पड़ने पर सामूहिक श्रमिक के रूप में कलेक्टर दर पर रखकर कार्य कराया जाता है।”
नगर परिषद का यह जवाब कई बड़े सवाल खड़े करता है:
परिभाषा का खेल:क्या ‘दैनिक वेतन भोगी’ और ‘कलेक्टर दर पर कार्यरत श्रमिक’ में इतना बड़ा अंतर है कि भर्ती प्रक्रिया और दस्तावेजों की जानकारी ही न दी जाए?
भर्ती की पारदर्शिता कहाँ? यदि ‘सामूहिक श्रमिक’ रखे जा रहे हैं, तो उनकी नियुक्ति का आधार क्या है? क्या इसके लिए कोई विज्ञापन निकाला गया या अपनों को ही पिछले दरवाजे से एंट्री दे दी गई?
3 साल बाद जवाब:आवेदन फरवरी 2023 में दिया गया और जवाब अप्रैल 2026 में आ रहा है। सूचना के अधिकार के 30 दिन की समय सीमा का यहाँ सरेआम उल्लंघन हुआ है।
भ्रष्टाचार की बू या प्रशासनिक चालाकी?
जानकारों का मानना है कि नगर परिषद ‘दैनिक वेतन भोगी’ शब्द को नकार कर असल में उन कर्मचारियों की सूची और उनके शैक्षणिक दस्तावेजों को छिपाना चाहती है जो वर्तमान में कार्यरत हैं। ‘सामूहिक श्रमिक’ (Casual Labour) बताकर परिषद यह जताना चाहती है कि ये कोई स्थाई व्यवस्था नहीं है, जबकि हकीकत में कई लोग वर्षों से इसी व्यवस्था में काम कर रहे हैं
आवेदक: सुंदर लाल बर्मन (वार्ड 12, मझौली)।
विभाग: नगर परिषद मझौली। भर्ती नियमों और कर्मचारियों के रिकॉर्ड को ‘परिभाषा’ के नाम पर छिपाने का प्रयास। देरी 2023 के आवेदन पर 2026 में मिला जवाब।
ब्यूरो रिपोर्ट: मझौली दर्पण न्यूज




