कलेक्टर का आदेश निरस्त, बिना जांच कार्रवाई पर कोर्ट की कड़ी टिप्पणी — “आंख मूंदकर नहीं चल सकता प्रशासन”
जबलपुर
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रशासनिक लापरवाही पर एक कड़ा और नजीर बन जाने वाला फैसला सुनाते हुए स्पष्ट संदेश दिया है कि बिना ठोस जांच के कार्रवाई करना अब महंगा पड़ेगा। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान न केवल जिला कलेक्टर के आदेश को खारिज किया, बल्कि दोषी अधिकारियों पर ₹50,000 का जुर्माना भी लगाया है। खास बात यह है कि यह राशि सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि संबंधित अधिकारियों की व्यक्तिगत जेब से वसूली जाएगी।
यह मामला छिंदवाड़ा जिले के चौरई क्षेत्र से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार, माइनिंग विभाग ने अवैध परिवहन के आरोप में एक ट्रक (RJ 14 GE 8519) को जब्त किया था। पूछताछ के दौरान ट्रक चालक ने सारंग रघुवंशी का नाम लिया, जिसके आधार पर विभाग ने पंचनामा तैयार कर लिया।
मामला जब जिला कलेक्टर के पास पहुंचा, तो उन्होंने बिना विस्तृत और निष्पक्ष जांच किए याचिकाकर्ता के खिलाफ जुर्माना लगा दिया। इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि केवल चालक के बयान के आधार पर कार्रवाई करना उचित नहीं है और यह प्रशासनिक लापरवाही का स्पष्ट उदाहरण है। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रशासन को तथ्यों की जांच किए बिना निर्णय लेने की आदत छोड़नी होगी।
कोर्ट ने कलेक्टर के आदेश को निरस्त करते हुए संबंधित अधिकारियों पर ₹50,000 का दंड लगाया और निर्देश दिया कि यह राशि व्यक्तिगत रूप से वसूली जाए।
हाईकोर्ट का यह फैसला प्रदेश के प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक सख्त चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। यह स्पष्ट संकेत है कि लापरवाही और बिना जांच के की गई कार्रवाई अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी, और इसके लिए जिम्मेदार अफसरों को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया जाएगा।
मझौली दर्पण न्यूज




