मध्य प्रदेश में इन दिनों “अफसरों की सुस्ती” और उसके विकास पर पड़ रहे असर को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में जोरदार बहस छिड़ी हुई है।
भोपाल
एक तरफ सरकार ‘मिशन मोड’ में काम करने का दावा कर रही है, तो दूसरी तरफ जमीनी हकीकत में कई योजनाएं फाइलों में ही अटकी नजर आ रही हैं।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने हाल ही में बड़ा प्रशासनिक संदेश देते हुए 11 से 26 IAS अफसरों के तबादले किए कलेक्टरों को दो टूक चेतावनी दी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए साफ कहा गया—“अब सिर्फ रिजल्ट देने वाले अफसर ही फील्ड में रहेंगे, बाकी को हटाया जाएगा।”
सरकार ने अब कलेक्टरों का रिपोर्ट कार्ड सिस्टम’ लागू करने के संकेत दिए हैं।
विकास की रफ्तार क्यों धीमी? 1. गजट नोटिफिकेशन की चूक
नगर पालिकाओं के अध्यक्षों के अधिकारों का राजपत्र में प्रकाशन न होने से कई जगह विकास कार्य ठप भुगतान और टेंडर अटक गए
2. फंड का पूरा उपयोग नहीं
रिपोर्ट्स के मुताबिक—कई विभाग केवल **70-75% बजट** ही खर्च कर पा रहे समय पर टेंडर नहीं निकलना फाइलों का लंबित रहना सीधे तौर पर विकास की गति पर ब्रेक
3. समन्वय की कमी मंत्रियों और अफसरों के बीच तालमेल की कमी के कारण— सड़क और सिंचाई जैसी बड़ी परियोजनाएं
समय सीमा से पीछे AI और टेक्नोलॉजी से ‘सुस्ती तोड़ने’ की कोशिश
सरकार अब टेक्नोलॉजी का सहारा लेकर सिस्टम सुधारने में जुटी है—SpaceTech और AI Policy 2026 लागू फाइल पेंडेंसी कम करने का प्रयास पारदर्शिता बढ़ाने का दावा साथ ही 2026 को कृषक कल्याण वर्ष घोषित कर अफसरों को जमीन पर उतरकर काम करने के निर्देश दिए गए हैं।
विपक्ष का आरोप है कि— सरकार केवल तबादलों का खेल खेल रही है अफसरशाही बेलगाम हो चुकी है वल्लभ भवन (मंत्रालय) में फाइलें दबाई जा रही हैं उनके मुताबिक, यही वजह है कि विकास कार्य समय पर पूरे नहीं हो पा रहे।
जमीनी असर: जनता हो रही परेशान नगर पालिकाओं में काम ठप भुगतान में देरी योजनाओं का लाभ समय पर नहीं मिल रहा सबसे ज्यादा असर गांव और छोटे शहरों में देखने को मिल रहा है।
मध्य प्रदेश में विकास की रफ्तार और अफसरशाही की कार्यशैली के बीच टकराव साफ नजर आ रहा है।
सरकार की सख्ती और तकनीकी प्रयासों के बावजूद, अगर जमीनी स्तर पर बदलाव नहीं हुआ, तो यह मुद्दा आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक संकट बन सकता है




