मध्य प्रदेश की राजनीति और नगरीय प्रशासन में उस वक्त हड़कंप मच गया, जब प्रदेश की 395 नगर पालिकाओं और नगर परिषदों के अध्यक्षों के निर्वाचन पर संवैधानिक संकट के बादल मंडराने लगे।
जबलपुर/भोपाल
चुनाव संपन्न होने के लंबे समय बाद भी ‘अधिसूचना’ (Gazette Notification) जारी न होने के कारण मामला अब माननीय उच्च न्यायालय की चौखट पर पहुँच गया है।
क्या है पूरा मामला?
प्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव तो संपन्न हो गए और अध्यक्षों ने पदभार भी ग्रहण कर लिया, लेकिन तकनीकी और कानूनी पेंच तब फंसा जब इनके निर्वाचन की आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं की गई। नियमों के मुताबिक, अधिसूचना के बिना किसी भी जनप्रतिनिधि का निर्वाचन पूर्ण नहीं माना जाता। इसी आधार पर याचिका दायर की गई थी, जिस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: छीने वित्तीय अधिकार
माननीय हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अधिसूचना के अभाव में इन अध्यक्षों को ‘विधिवत निर्वाचित’ नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने आदेश दिया है कि:
* वर्तमान अध्यक्षों के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार तत्काल प्रभाव से सीमित किए जाएं।
* संबंधित निकायों के वित्तीय लेन-देन और महत्वपूर्ण निर्णयों का अधिकार सीएमओ (CMO) या एसडीएम (SDM) को सौंपा जाए।
अंकों का गणित: कहाँ-कहाँ मंडरा रहा खतरा?
इस फैसले ने प्रदेश के करीब 400 छोटे-बड़े शहरों की सरकार को हिलाकर रख दिया है। संवैधानिक खतरे की जद में आने वाले निकायों की संख्या इस प्रकार है:
* नगर पालिका: 99 अध्यक्ष
* नगर परिषद: 297 अध्यक्ष
* कुल प्रभावित निकाय: 395
प्रशासनिक खेमे में खलबली
हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब सरकार और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। यदि समय रहते अधिसूचना जारी नहीं की गई, तो इन सभी निकायों में विकास कार्य ठप पड़ सकते हैं और अध्यक्षों को अपनी कुर्सी से हाथ धोना पड़ सकता है।
ब्यूरो रिपोर्ट: मझौली दर्पण न्यूज़




