प्रदेश में मांझी, निषाद, केवट, कहार और भोई समाज की वर्षों पुरानी मांग एक बार फिर मुखर हो गई है।
भोपाल/जबलपुर
इन समुदायों ने अनुसूचित जनजाति (ST) में शामिल किए जाने को लेकर सरकार से सीधा और स्पष्ट जवाब मांगा है। समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि अब आश्वासन नहीं, बल्कि आधिकारिक स्थिति और तय समयसीमा सार्वजनिक की जाए।
समाज के नेताओं ने सवाल उठाए हैं—
क्या राज्य सरकार ने ST में शामिल करने का औपचारिक प्रस्ताव केंद्र को भेजा है?
यदि भेजा है तो उसका फाइल नंबर और तारीख क्या है?
क्या प्रस्ताव को भारत के महापंजीयक (RGI) और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को भेजा गया?
संसद में संशोधन विधेयक कब लाया जाएगा?
पूरी प्रक्रिया की टाइमलाइन घोषित क्यों नहीं की जा रही?
विशेषज्ञ बताते हैं कि किसी भी जाति को ST सूची में शामिल करने की प्रक्रिया केवल राजनीतिक घोषणा से पूरी नहीं होती। इसके लिए राज्य सरकार की संस्तुति, केंद्र सरकार की स्वीकृति, RGI की जांच, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की अनुशंसा और अंततः संसद द्वारा संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश में संशोधन आवश्यक होता है। अंतिम अधिसूचना राष्ट्रपति द्वारा जारी की जाती है।
इस पूरी प्रक्रिया में केंद्रीय भूमिका भारत सरकार की होती है, जबकि संसद में विधेयक पारित होना अनिवार्य है। समाज का कहना है कि यदि राज्य सरकार ने प्रस्ताव भेजा है तो उसकी स्थिति सार्वजनिक की जाए, और यदि नहीं भेजा तो स्पष्ट बताया जाए कि बाधा कहां है।
समाज के युवाओं और संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द स्पष्ट जवाब नहीं मिला तो प्रदेशभर में चरणबद्ध आंदोलन किया जाएगा। उनका तर्क है कि ST दर्जा मिलने से शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में संवैधानिक अवसर मिलेंगे, जो सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण के लिए आवश्यक हैं।
अब देखना यह है कि सरकार इस लंबे समय से लंबित मांग पर क्या आधिकारिक रुख स्पष्ट करती है और क्या वास्तव में ST सूची में शामिल करने की संवैधानिक प्रक्रिया आगे बढ़ती है या यह मुद्दा फिर राजनीतिक वादों तक सीमित रह जाता है।




