भागीरथपुरा में सवालों के घेरे में प्रशासन
इंदौर
इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में 24 दिसंबर से 6 जनवरी के बीच फैली गंभीर उल्टी-दस्त की बीमारी ने पूरे इलाके को दहशत में डाल दिया। इस दौरान कई लोगों की मौत हो गई, जबकि दर्जनों नागरिकों को हालत बिगड़ने पर अस्पतालों में भर्ती कराना पड़ा। मामला सामने आने के बाद प्रशासन हरकत में आया और अब तक 18 प्रभावित परिवारों को मुआवज़ा दिया जा चुका है।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा विवाद मौतों की वास्तविक संख्या को लेकर खड़ा हो गया है। मध्य प्रदेश सरकार का आधिकारिक दावा है कि इस बीमारी से केवल आठ लोगों की मौत हुई है, जबकि स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि मृतकों की संख्या इससे कहीं अधिक है। जिन परिवारों को मुआवज़ा दिया गया है, उनकी संख्या स्वयं प्रशासनिक दावों पर सवाल खड़े कर रही है।
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि शुरुआती दिनों में बीमारी को गंभीरता से नहीं लिया गया, न ही समय पर स्वास्थ्य शिविर लगाए गए और न ही स्वच्छ पेयजल की समुचित व्यवस्था की गई। कई लोगों का कहना है कि दूषित पानी और गंदगी के कारण ही यह बीमारी फैली, लेकिन अब तक जिम्मेदारों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है।
प्रशासन का कहना है कि हालात नियंत्रण में हैं और स्वास्थ्य विभाग द्वारा जांच कराई जा रही है। वहीं, विपक्ष और जनप्रतिनिधियों ने पूरे मामले की स्वतंत्र जांच, मौतों की वास्तविक संख्या सार्वजनिक करने और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।
भागीरथपुरा की यह घटना एक बार फिर शहरी इलाकों में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं, जल आपूर्ति और प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा रही है। सवाल यह है कि क्या मुआवज़ा देकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया जाएगा या फिर इस त्रासदी से सबक लेकर भविष्य में ऐसे हादसों को रोका जाएगा?




