एक ओर प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव “एक पेड़ मां के नाम, एक बगिया मां के नाम” जैसी योजनाओं से पर्यावरण संरक्षण की मिसाल पेश कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सिहोरा वन परिक्षेत्र अंतर्गत आने वाले मझौली वन क्षेत्र में लगातार जंगलों का सफाया बदस्तूर जारी है।
मझौली जबलपुर
हालात ऐसे हैं कि रात के अंधेरे में चल रही आर मशीनें खुलेआम पेड़ों को धराशायी कर रही हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है।
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि वन विभाग की मिलीभगत और राजनीतिक संरक्षण के बिना इतना बड़ा खेल संभव ही नहीं। लकड़ी से भरे ट्रैक्टर-ट्रॉलियाँ बेखौफ मुख्य सड़क से गुजरते दिख जाते हैं, लेकिन रोकने-टोकने वाला कोई नहीं। सवाल यह है कि जब मुख्यमंत्री स्वयं पर्यावरण संरक्षण को लेकर प्रतिबद्ध हैं, तो आखिर मझौली वन क्षेत्र को किसकी नजर लग गई?
सूत्र बताते हैं कि यह अवैध कटाई महज कुछ पेड़ों की चोरी नहीं, बल्कि करोड़ों रुपए के अवैध व्यापार का हिस्सा है। अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ियां इस हरियाली से वंचित हो जाएँगी।
अब बड़ा सवाल— जंगलों की यह खुली लूट आखिर किसके संरक्षण में जारी है?
क्या जिम्मेदार अधिकारी अंजान हैं या जानबूझकर आँखें मूंदे बैठे हैं?
पर्यावरण प्रेमी और ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए, ताकि मझौली का वन क्षेत्र बर्बादी की कगार पर न पहुँच जाए।
जंगल नहीं बचेंगे, तो जीवन कैसे बचेगा?




