प्रिंट मीडिया पर बड़ा संकट: देश में 80 हजार से अधिक पत्र-पत्रिकाओं के टाइटल रद्द, डाक नियमों में बदलाव से 30 हजार छोटे अखबारों के अस्तित्व पर खतरा

 रजिस्टर्ड पब्लिकेशन्स की संख्या में 50% से अधिक की भारी गिरावट

 * देश में पंजीकृत प्रकाशन 1.54 लाख से घटकर मात्र 74,374 रह गए

 * डाक विभाग के नए प्रावधानों से मझोले और ग्रामीण अखबारों की वितरण व्यवस्था लड़खड़ाई

नई दिल्ली

देश में प्रिंट मीडिया क्षेत्र में एक बड़ा फेरबदल देखने को मिला है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, बीते एक साल के भीतर 80 हजार से अधिक पत्र-पत्रिकाओं के टाइटल (पंजीकरण) रद्द कर दिए गए हैं। इस बड़े प्रशासनिक कदम के चलते देश में कुल पंजीकृत पत्र-पत्रिकाओं की संख्या सीधे आधी रह गई है। जहां पहले यह आंकड़ा करीब 1.54 लाख था, वहीं अब घटकर केवल 74,374 पर सिमट गया है।

निष्क्रिय और गैर-अनुपालन वाले शीर्षकों पर कार्रवाई

विभागीय सूत्रों के मुताबिक, यह कार्रवाई लंबे समय से निष्क्रिय पड़े, वार्षिक विवरण (Annual Statements) दाखिल न करने वाले और अनिवार्य नियामकीय शर्तों का पालन न करने वाले प्रकाशनों के खिलाफ की गई है। सरकार द्वारा प्रिंट मीडिया सेक्टर के डिजिटलीकरण और डेटाबेस को पारदर्शी व वास्तविक बनाने की दिशा में यह कदम उठाया गया है। जांच में पाया गया कि बड़ी संख्या में टाइटल केवल कागजों पर दर्ज थे और उनका नियमित प्रकाशन नहीं हो रहा था।

डाक नियमों में बदलाव: 30 हजार लघु समाचार पत्रों पर दोहरी मार

एक तरफ जहां टाइटल रद्द होने से पंजीकृत पत्र-पत्रिकाओं की संख्या घटी है, वहीं दूसरी ओर डाक विभाग द्वारा लागू किए गए नए नियमों ने छोटे व मझोले प्रकाशकों की मुश्किलें कई गुना बढ़ा दी हैं।

अनुमान के अनुसार, देश के 30 हजार से अधिक छोटे और आंचलिक प्रकाशनों के सामने अब वितरण का गंभीर संकट खड़ा हो गया है:

 * रियायती डाक दरों में सख्ती: डाक विभाग द्वारा प्रेस पैकेट और पत्र-पत्रिकाओं के प्रेषण से जुड़ी रियायती दरों व पात्रता शर्तों में बदलाव किए गए हैं।

 * वितरण लागत में उछाल: नए नियमों और सख्त प्रक्रियाओं के कारण ग्रामीण एवं दूरदराज के क्षेत्रों तक अखबार भेजना अत्यधिक महंगा हो गया है।

 * पाठकों तक पहुंच सीमित: मुख्य रूप से डाक नेटवर्क पर निर्भर रहने वाली स्थानीय, पाक्षिक और मासिक पत्रिकाओं के लिए नियमित पाठकों तक प्रतियां पहुंचाना आर्थिक रूप से घाटे का सौदा साबित हो रहा है।

छोटे प्रकाशकों में निराशा, नीति में राहत की मांग

इस दोहरी मार से देश भर के लघु एवं मध्यम समाचार पत्र संगठन चिंतित हैं। प्रकाशकों का कहना है कि डिजिटल मीडिया के दौर में पहले से ही प्रिंट मीडिया विज्ञापन और बढ़ती लागत से जूझ रहा है। ऐसे में डाक नियमों में रियायत समाप्त होने या सख्त शर्तें थोपे जाने से क्षेत्रीय, स्थानीय और भाषाई पत्रकारिता को भारी नुकसान पहुंचेगा। प्रकाशक संगठनों ने सरकार और डाक विभाग से नियमों की समीक्षा कर छोटे व स्वतंत्र प्रकाशनों को विशेष रियायत देने की मांग की है।

सुंदरलाल बर्मनhttps://majholidarpan.com/
Sundar Lal barman (41 years) is the editor of MajholiDarpan.com. He has approximately 10 years of experience in the publishing and newspaper business and has been a part of the organization for the same number of years. He is responsible for our long-term vision and monitoring our Company’s performance and devising the overall business plans. Under his Dynamic leadership with a clear future vision, the company has progressed to become one of Hindi e-newspaper , with Jabalpur district.

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