पारदर्शिता और सुशासन के दावों के बीच, जबलपुर जिले की जनपद पंचायत मझौली एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में है।
जबलपुर / भोपाल:
मामला समाज के सबसे पिछड़े तबके—मछुआरा समुदाय—के हक से जुड़ी योजनाओं और सरकारी तालाबों के पट्टा आवंटन से जुड़ा है। आरटीआई (सूचना का अधिकार) के तहत मांगी गई पांच वर्षों की महत्वपूर्ण वित्तीय और प्रशासनिक जानकारियों को दबाने का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है।
अधिकारियों की इस रहस्यमयी चुप्पी से योजनाओं में किसी बड़े वित्तीय खेल और अपात्रों को रेवड़ियां बांटने की आशंका गहरा गई है। विभाग की इस हठधर्मिता से तंग आकर मझौली के आरटीआई कार्यकर्ता श्री शिवम साहू ने अब मध्यप्रदेश राज्य सूचना आयोग, भोपाल में द्वितीय अपील दायर कर सीधे तौर पर जंग छेड़ दी है।
क्या है ‘दाल में काला’ होने का पूरा मामला?
शिकायत के अनुसार, आवेदक शिवम साहू ने 03 दिसंबर 2025 को एक आरटीआई आवेदन के जरिए जनपद पंचायत मझौली की ग्राम पंचायतों में वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच मछुआरा कल्याण योजनाओं, लाभार्थियों की सूची, शासकीय तालाबों के पट्टा आवंटन और बजट खर्च की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं।
लापरवाही की क्रोनोलॉजी:
03 दिसंबर 2025: आरटीआई आवेदन दाखिल किया गया।
जनवरी 2026:कानूनन 30 दिन की समय-सीमा बीतने के बाद भी लोक सूचना अधिकारी ने मौन साधे रखा।
11 फरवरी 2026: प्रथम अपीलीय अधिकारी (सीईओ, जिला पंचायत जबलपुर) के पास गुहार लगाई गई, लेकिन वहां से भी आवेदक को सिर्फ निराशा हाथ लगी।
आखिर ऐसा क्या है इन फाइलों में, जिसे जिला पंचायत से लेकर जनपद पंचायत तक के जिम्मेदार अधिकारी जनता की नजरों से छुपा कर रखना चाहते हैं?
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का हवाला: ‘यह कोई निजी संपत्ति नहीं’
अपीलकर्ता ने राज्य सूचना आयोग के समक्ष देश की सर्वोच्च अदालत (Central Board of Secondary Education Vs. Aditya Bandopadhyay) के नजीर बन चुके फैसले का हवाला देते हुए विभाग को कटघरे में खड़ा किया है। अपील में साफ कहा गया है कि:
* जनता के टैक्स के पैसे (सार्वजनिक धन) से चलने वाली योजनाओं और गरीब मछुआरों के हक की जानकारी कोई ‘निजी जानकारी’ नहीं है, जिसे धारा 8(1)(j) के तहत छुपाया जा सके।
यह सीधे तौर पर व्यापक जनहित का विषय** है। रिकॉर्ड न देना यह साबित करता है कि या तो सरकारी तंत्र का रिकॉर्ड मैनेजमेंट पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है, या फिर इसके पीछे किसी बड़े घोटाले पर पर्दा डालने की प्रशासनिक साजिश चल रही है।
कड़े दंड और ₹25,000 की क्षतिपूर्ति की मांग
सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने और मानसिक व आर्थिक प्रताड़ना से क्षुब्ध होकर पीड़ित ने राज्य सूचना आयोग से आरटीआई अधिनियम की धाराओं के तहत सख्त से सख्त कार्रवाई की मांग की है:
| क्रमांक | आवेदक की प्रमुख मांगें | कानूनी आधार |
| 1. | जनपद की सभी ग्राम पंचायतों का पंचायत-वार रिकॉर्ड तुरंत उपलब्ध कराया जाए। | धारा 7(1) |
| 2. | जानकारी दबाने वाले दोषी लोक सूचना अधिकारी पर ₹25,000 का अधिकतम जुर्माना** लगे। | धारा 20(1) |
| 3. | आवेदक को हुए मानसिक और आर्थिक नुकसान के एवज में ₹25,000 की क्षतिपूर्ति दी जाए। | धारा 19(8)(b) |
| 4.| इस पूरे ‘सूचना दमन’ के पीछे के वित्तीय और पट्टा आवंटन घोटाले की उच्च स्तरीय जांच हो। | विशेष निर्देश |
बड़ा सवाल: दावों में अंत्योदय, जमीन पर मौन व्रत?
सरकार एक तरफ समाज के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति और मछुआरा समाज को मुख्यधारा में लाने के लिए बड़े-बड़े विज्ञापनों और मंचों से हुंकार भरती है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर जब उन्हीं योजनाओं का हिसाब मांगा जाता है, तो जिम्मेदार अधिकारी ‘मौन व्रत’ धारण कर लेते हैं।
अब हर किसी की नजरें मध्यप्रदेश राज्य सूचना आयोग के आगामी कदम पर टिकी हैं। देखना होगा कि आयोग के डंडे के बाद मझौली जनपद पंचायत के इस ‘तालाब और पट्टा खेल’ की परतें कब तक खुलती हैं और जनता की गाढ़ी कमाई का सच कब बाहर आता है।
ब्यूरो रिपोर्ट खोजी समाचार नेटवर्क




