एक ओर सरकार बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी ओर मझौली सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) में नियमों का अजीबोगरीब हवाला देकर मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।
मझौली
यहाँ कुत्ते के काटने (रेबीज) के शिकार मरीजों को यह कहकर लौटाया जा रहा है कि “जब तक पांच मरीज इकट्ठे नहीं होंगे, इंजेक्शन नहीं लगेगा।”
ताजा मामले में, रेबीज के इंजेक्शन के लिए आए एक मरीज को इमरजेंसी के दौरान भी वैक्सीन लगाने से मना कर दिया गया। अस्पताल प्रबंधन का तर्क है कि वैक्सीन की एक वायल (शीशी) में पांच डोज होते हैं, और जब तक पांच मरीज नहीं आते, उसे खोला नहीं जा सकता। सवाल यह उठता है कि क्या रेबीज जैसा घातक वायरस, जिसमें देरी जानलेवा साबित हो सकती है, बाकी चार मरीजों के आने का इंतजार करेगा?
जब इस संबंध में स्वास्थ्य केंद्र के डॉ. दीपक गायकवाड़ से बात की गई, तो उन्होंने कोई स्पष्ट स्पष्टीकरण देने के बजाय गोल-मोल जवाब देकर पल्ला झाड़ लिया। डॉक्टर के इस रवैये से मरीजों और उनके परिजनों में भारी आक्रोश व्याप्त है।
क्या कहती है गाइडलाइन
रेबीज एक जानलेवा बीमारी है। नियमों के अनुसार, रेबीज की वैक्सीन (ARV) मरीज के आने के तुरंत बाद अनिवार्य रूप से लगानी चाहिए। वैक्सीन बर्बाद होने के डर से मरीज की जान जोखिम में डालना चिकित्सा नैतिकता और सरकारी निर्देशों का खुला उल्लंघन है।
मझौली क्षेत्र की जनता ने स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारियों से मांग की है कि इस अव्यवस्था पर तुरंत संज्ञान लिया जाए और लापरवाह कर्मचारियों पर कार्रवाई की जाए। यदि समय पर इंजेक्शन न मिलने के कारण किसी अनहोनी होती है, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा?




