उमध्य प्रदेश की आर्थिक स्थिति को लेकर एक बार फिर चिंता के बादल गहराने लगे हैं।
भोपाल
आलम यह है कि प्रदेश की विकास की गाड़ी अब अपनी कमाई से नहीं, बल्कि भारी-भरकम कर्ज की बैसाखी पर टिक गई है। सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सरकार ‘कर्ज लो और घी पियो’ की नीति पर चल रही है?
मार्च के बाद अप्रैल में भी ‘लोन की भूख’ बरकरार
अभी पिछले महीने यानी मार्च में सरकार ने 18 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का बड़ा लोन लेकर रिकॉर्ड बनाया था। लेकिन, आर्थिक जानकारों को हैरानी तब हुई जब यह भूख शांत नहीं हुई। ताजा नोटिफिकेशन के अनुसार, मोहन सरकार मंगलवार को फिर से 2800 करोड़ रुपये का ऋण लेने जा रही है। इस नए कर्ज के साथ, अकेले इस महीने (अप्रैल) का कुल आंकड़ा 4600 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा।
खजाने की हालत खस्ता, आयोजनों के लिए भी उधारी
प्रदेश के खजाने की हालत फिलहाल ऐसी है कि त्योहारों की चमक फीकी न पड़े और विशेष सरकारी आयोजनों का तामझाम बना रहे, इसके लिए भी उधारी का सहारा लेना पड़ रहा है। सूत्रों की मानें तो राजस्व का बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज के ब्याज चुकाने और स्थापना व्यय में ही खत्म हो रहा है, जिससे जमीनी विकास कार्यों के लिए फंड की कमी साफ नजर आ रही है।
एक तरफ सरकार इसे विकास के लिए आवश्यक कदम बता रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष और आर्थिक विशेषज्ञ इसे ‘डेब्ट ट्रैप’ (कर्ज का जाल) मान रहे हैं। अगर उधारी की यही रफ्तार रही, तो आने वाले समय में प्रदेश के हर नागरिक पर कर्ज का बोझ असहनीय स्तर तक पहुँच सकता है।
“सरकारी दावों और हकीकत के बीच झूलता मध्य प्रदेश का बजट अब केवल कागजी जादूगरी बनकर रह गया है।”




