विंध्य क्षेत्र में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सड़कों के नाम पर करोड़ों रुपये का डामर फाइलों में ही ‘पिघल’ गया।
रीवा/मऊगंज।
आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW), रीवा ने एक ऐसी कार्रवाई की है जिसने विभाग से लेकर ठेकेदारों के सिंडिकेट तक हड़कंप मचा दिया है।
फर्जी बिलों से ‘काली’ हुई सड़कें: ₹18.59 करोड़ का खेल
EOW की लंबी जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि MPRRDA (मप्र ग्रामीण सड़क विकास प्राधिकरण) के तहत बनी सड़कों में गुणवत्ता के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की गई। घोटाले की कार्यप्रणाली (Modus Operandi) कुछ इस तरह थी:
नकली रसीदें: IOCL के नाम पर डामर खरीदी के कूटरचित और फर्जी बिल तैयार किए गए।
कागजी सड़कें:असलियत में घटिया डामर डाला गया, लेकिन कागजों में उच्च गुणवत्ता दिखाकर सरकारी खजाने में सेंध लगाई गई।
*दो जिलों में जाल: रीवा में 12.71 करोड़ और मऊगंज में 5.88 करोड़ रुपये की हेराफेरी पकड़ी गई है।
सिंडिकेट का पर्दाफाश: 44 आरोपियों पर एफआईआर
EOW ने इस घोटाले में 44 लोगों को आरोपी बनाया है। इसमें वह ‘नापाक गठजोड़’ सामने आया है जिसमें कुर्सी पर बैठे अफसर और लाभ कमाने वाले ठेकेदार एक ही थाली के चट्टे-बट्टे निकले।
रीवा क्षेत्र:27 आरोपी (अधिकारी, इंजीनियर और ठेकेदार)।
मऊगंज क्षेत्र: 17 आरोपी।
इन सभी पर IPC 420, 467, 468, 471और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम जैसी संगीन धाराओं के तहत शिकंजा कसा गया है।
जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो विकास की राह में गड्ढे होना लाजमी है। यह घोटाला न केवल आर्थिक अपराध है, बल्कि उन आम नागरिकों के जीवन से खिलवाड़ है जो सुरक्षित सड़कों की उम्मीद करते हैं।
बड़ा सवाल: क्या EOW की यह फाइल केवल इंजीनियरों और ठेकेदारों तक सिमट कर रह जाएगी, या ‘सफेदपोश’ आकाओं तक भी आंच पहुंचेगी?
ब्यूरो रिपोर्ट:- मझौली दर्पण न्यूज़




