सरकारी दफ्तरों में समयपालन को लेकर सख्त संदेश देने के बावजूद हालात में अपेक्षित सुधार नजर नहीं आ रहा है।
भोपाल
मोहन यादव की स्पष्ट चेतावनी के बाद भी कई विभागों में कर्मचारी और अधिकारी निर्धारित समय से देर से पहुंच रहे हैं, जिससे आम जनता को परेशानी उठानी पड़ रही है।
हाल ही में मुख्यमंत्री ने साफ कहा था कि सरकारी कार्यालयों में समय पर उपस्थिति सुनिश्चित की जाए, अन्यथा जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी। निर्देशों में बायोमेट्रिक उपस्थिति की नियमित मॉनिटरिंग और आकस्मिक निरीक्षण बढ़ाने की बात भी शामिल थी। बावजूद इसके, कई जिलों से लेटलतीफी की शिकायतें सामने आ रही हैं।
सुबह तय समय पर कार्यालय खुलने के बावजूद संबंधित अधिकारी-कर्मचारियों के अनुपस्थित रहने से प्रमाणपत्र, पेंशन, राजस्व और अन्य जरूरी कार्यों के लिए आए लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले नागरिकों को विशेष रूप से असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।
सूत्रों के मुताबिक हाल के औचक निरीक्षणों में कई कार्यालयों में उपस्थिति रजिस्टर और बायोमेट्रिक रिकॉर्ड में विसंगतियां पाई गईं। कुछ स्थानों पर अधिकारी स्वयं देर से पहुंचे, जबकि अधीनस्थ कर्मचारियों की उपस्थिति भी अधूरी मिली।
सरकार ने संकेत दिए हैं कि लगातार लापरवाही पर वेतन कटौती, कारण बताओ नोटिस और विभागीय कार्रवाई जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। प्रशासनिक सुधार के लिए डिजिटल निगरानी तंत्र को और मजबूत करने की तैयारी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि समयपालन केवल आदेश से नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने से सुनिश्चित होता है। यदि सख्ती जमीनी स्तर पर लागू हुई तो दफ्तरों की कार्यसंस्कृति में सुधार संभव है।
अब बड़ा सवाल यही है—क्या मुख्यमंत्री की चेतावनी के बाद भी लेटलतीफी पर लगाम लगेगी, या आदेश कागजों तक ही सीमित रह जाएंगे?




