लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनावों से नहीं, बल्कि व्यवहार में बराबरी से होती है।
नई दिल्ली
आज देश में एक सवाल गूंज रहा है—क्या हम सच में बराबरी वाले लोकतंत्र में जी रहे हैं, या यह सिर्फ काग़ज़ों तक सीमित है? जिस दिन नेता सरकारी अस्पताल में आम नागरिक की तरह इलाज कराएंगे
जिस दिन मंत्री का लाडला बेटा भी सरकारी स्कूल में पढ़ेगा
जिस दिन VVIP के लिए सड़कें नहीं रोकी जाएंगी
जिस दिन एम्बुलेंस को VIP काफिले से पहले रास्ता मिलेगा
और जिस दिन अमीर–गरीब, VIP–आम नागरिक सब एक ही लाइन में खड़े होकर काम कराएंगे—उसी दिन मानिएगा कि सच्ची बराबरी आ चुकी है।
आज की हकीकत यह है कि सुविधाएं पद देखकर बदल जाती हैं, कानून ताकत देखकर झुकता है और सड़कें पहचान देखकर खुलती–बंद होती हैं। आम आदमी जाम में फंसा रहता है, जबकि वीआईपी काफिले सायरन बजाते हुए निकल जाते हैं—चाहे सामने एम्बुलेंस ही क्यों न खड़ी हो।
विशेषज्ञ मानते हैं कि वीआईपी संस्कृति लोकतंत्र की आत्मा के खिलाफ है। लोकतंत्र का मतलब है—समान अधिकार, समान अवसर और समान व्यवहार। लेकिन जब जनप्रतिनिधि और प्रभावशाली लोग खुद को कानून और व्यवस्था से ऊपर मानने लगें, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे राजशाही की शक्ल लेने लगता है।




