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Thursday, February 19, 2026

₹400 के रिचार्ज में अनलिमिटेड कॉल, फिर विधायक को ₹9000 महीना फोन भत्ता क्यों?

जनता पूछ रही है—यह सुविधा है या सरकारी धन की खुली फिजूलखर्ची?

नई दिल्ली/भोपाल

देश में आम नागरिक आज ₹399–₹449 में अनलिमिटेड कॉल और डेटा वाला मोबाइल रिचार्ज करा लेता है, वहीं जनप्रतिनिधियों को ₹9000 प्रति माह फोन भत्ता दिया जाना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। महंगाई, बेरोजगारी और कटौती के दौर में जब आम आदमी हर खर्च से पहले दस बार सोचने को मजबूर है, तब यह विशेष सुविधा नैतिकता और जवाबदेही के मानकों पर खरी कैसे उतरती है?

प्रश्न सीधा है—जब ₹400 में अनलिमिटेड कॉल संभव है, तो ₹9000 किस आधार पर?

क्या यह राशि वास्तविक जरूरत पर आधारित है या वर्षों पुराने नियमों की देन?

क्या कहता है कानून?

विधायकों/सांसदों को मिलने वाले वेतन और भत्ते विधानसभा/संसद द्वारा बनाए गए अधिनियमों और नियमों के तहत तय होते हैं। तकनीकी रूप से देखा जाए तो यह भत्ता कानूनी है, लेकिन सवाल कानून की मंशा और वर्तमान परिस्थितियों की प्रासंगिकता का है।

जब टेलीकॉम सेक्टर में दरें ऐतिहासिक रूप से नीचे आ चुकी हैं, तब भी भत्तों में संशोधन न होना कानूनी चूक नहीं, लेकिन प्रशासनिक लापरवाही जरूर मानी जा सकती है।

 जनता का पैसा, जनता से जवाब क्यों नहीं?

यह भत्ता सरकारी खजाने, यानी जनता के टैक्स के पैसे से दिया जाता है। ऐसे में पारदर्शिता और तर्कसंगतता अनिवार्य है। यदि विधायक को अतिरिक्त संचार सुविधाएं चाहिए भी, तो उसका स्पष्ट औचित्य, उपयोग विवरण और सीमा तय होनी चाहिए।

 बड़ा सवाल—सुविधा या विशेषाधिकार?

एक तरफ सरकारें जनता से डिजिटल इंडिया, किफायत और मितव्ययता की बात करती हैं, दूसरी तरफ जनप्रतिनिधियों के लिए अनुपातहीन सुविधाएं जारी रहती हैं। यह स्थिति लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करती है और जनता के बीच अविश्वास को जन्म देती है।

भारत पूछता है—क्या अब समय नहीं आ गया कि विधायकों के भत्तों की समीक्षा हो?

क्या यह राशि वास्तविक खर्च के अनुरूप घटाई नहीं जानी चाहिए?
क्या जनप्रतिनिधि भी आम नागरिक की तरह एक समान नियमों में नहीं आ सकते?
जब तक इन सवालों का स्पष्ट और ईमानदार जवाब नहीं मिलेगा, तब तक ₹9000 का फोन भत्ता कानूनी होते हुए भी नैतिक कटघरे में खड़ा रहेगा।

क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं, बल्कि अधिकार है।

सुंदरलाल बर्मन
सुंदरलाल बर्मनhttps://majholidarpan.com/
Sundar Lal barman (41 years) is the editor of MajholiDarpan.com. He has approximately 10 years of experience in the publishing and newspaper business and has been a part of the organization for the same number of years. He is responsible for our long-term vision and monitoring our Company’s performance and devising the overall business plans. Under his Dynamic leadership with a clear future vision, the company has progressed to become one of Hindi e-newspaper , with Jabalpur district.

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