क्या आपको पता है कि आपके गाँव की सड़क, पानी, नाली और साफ-सफाई के लिए जो सरकारी फंड आता है, वह किसी सरपंच, सचिव या नेता की मेहरबानी नहीं, बल्कि आपका संवैधानिक हक है?
मझौली जबलपुर
ग्राम पंचायतों को हर साल लाखों-करोड़ों रुपये की राशि विभिन्न योजनाओं के तहत मिलती है—जैसे मनरेगा स्वच्छ भारत मिशन और प्रधानमंत्री आवास योजना। इन योजनाओं का उद्देश्य साफ है—गाँव का विकास और ग्रामीणों का जीवन स्तर सुधारना।
लेकिन बड़ा सवाल यह है—क्या यह पैसा सही जगह खर्च हो रहा है?
विकास या दिखावा?
अक्सर कागजों में सड़क बन जाती है, लेकिन ज़मीन पर गड्ढे ही गड्ढे रहते हैं। नाली निर्माण का भुगतान हो जाता है, लेकिन पानी आज भी सड़कों पर बहता दिखता है। पंचायत भवन की मरम्मत के नाम पर राशि निकलती है, पर हालात जस के तस रहते हैं।
यह सिर्फ लापरवाही नहीं—यह आपके अधिकारों का हनन है।
हिसाब मांगना अधिकार भी, जिम्मेदारी भी भारत का संविधान और सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 हर नागरिक को यह ताकत देता है कि वह पूछ सके—गाँव में कितना फंड आया?
किस मद में कितना खर्च हुआ?
किस ठेकेदार को भुगतान किया गया?
कार्य की गुणवत्ता की जांच किसने की?
सवाल पूछना अपराध नहीं है। सवाल पूछना लोकतंत्र की आत्मा है।
चुप्पी सबसे बड़ा भ्रष्टाचार जब नागरिक चुप रहते हैं, तभी गड़बड़ियां बढ़ती हैं। याद रखिए—सरकारी पैसा जनता का पैसा है। यदि आप अपने गाँव के विकास पर निगरानी नहीं रखेंगे, तो कोई और क्यों रखेगा?
ग्राम सभा में जाएँ। प्रस्तावों की जानकारी लें। कार्यों का भौतिक सत्यापन करें। जरूरत पड़े तो आरटीआई लगाएँ।
क्योंकि—सवाल पूछना गलत नहीं, बल्कि एक जागरूक नागरिक की पहचान है।”
अब वक्त आ गया है कि गाँव का हर नागरिक
कहे—विकास चाहिए तो हिसाब भी चाहिए!




