हाल ही में UGC बिल के विरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक ने एक बार फिर यह साबित किया है कि जब किसी वर्ग के संवैधानिक अधिकारों पर आंच आती है, तो न्यायपालिका हस्तक्षेप करती है।
जबलपुर
इसी कड़ी में माझी समाज के प्रबुद्धजनों ने *स्टेट रिआर्गनाइजेशन एक्ट 1956 पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
माझी समाज का कहना है कि यदि राज्य पुनर्गठन के समय उनके सामाजिक, शैक्षणिक और संवैधानिक हितों पर गंभीरता से विचार किया गया होता, तो आज उन्हें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता। समाज का आरोप है कि ऐतिहासिक निर्णयों में उपेक्षा के कारण उनके आरक्षण, पहचान और प्रतिनिधित्व से जुड़े अधिकार प्रभावित हुए हैं, जो संविधान की मूल भावना के विपरीत है।
माझी समाज के लोगों का मानना है कि जैसे UGC बिल के मामले में न्यायिक हस्तक्षेप हुआ, वैसे ही उनके साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय की भी पुनर्समीक्षा होनी चाहिए। समाज ने केंद्र और राज्य सरकार से मांग की है कि माझी समाज के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा हेतु ठोस कदम उठाए जाएं और वर्षों से चली आ रही उपेक्षा का न्यायसंगत समाधान निकाला जाए।




