क्षेत्र में इन दिनों पेट्रोल-डीजल, गैस और पानी जैसी मूलभूत समस्याएं विकराल रूप लेती जा रही हैं।
मझौली/जबलपुर
आम जनता रोजमर्रा की जरूरतों के लिए संघर्ष कर रही है, लेकिन विडंबना यह है कि जिन जनप्रतिनिधियों पर इन समस्याओं के समाधान की जिम्मेदारी है, वे इन मुद्दों से कोसों दूर नजर आ रहे हैं।
जहां एक ओर लोग घंटों पेट्रोल पंपों पर लाइन में खड़े हैं, गैस सिलेंडर के लिए भटक रहे हैं और पानी के लिए जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जनप्रतिनिधि उद्घाटन, भूमि पूजन और औपचारिक कार्यक्रमों में व्यस्त दिखाई दे रहे हैं। मानो जमीनी समस्याएं उनकी प्राथमिकता में ही नहीं हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि आज हालात ऐसे बन गए हैं कि जनता पेट्रोल-डीजल के लिए कतारों में खड़ी है,महिलाएं गैस और पानी के लिए परेशान हैं किसान और मजदूर ईंधन संकट से प्रभावित हो रहे हैं लेकिन जनप्रतिनिधि मंचों पर भाषण और फीता काटने में व्यस्त हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जब चुनाव नजदीक होते हैं, तब यही जनप्रतिनिधि जनता के बीच सक्रिय नजर आते हैं, लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होते हैं, जमीनी मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
अभी चुनाव दूर हैं, इसलिए शायद आम जनता की समस्याएं भी प्राथमिकता में नहीं हैं।
यह सवाल अब उठने लगा है कि क्या विकास केवल उद्घाटन और भूमि पूजन तक सीमित रह गया है? क्या जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी सिर्फ औपचारिकताओं तक ही रह गई है?
जब तक मूलभूत समस्याओं—पानी, बिजली, ईंधन—का समाधान नहीं होगा, तब तक विकास के दावे खोखले ही नजर आएंगे।
अब सवाल सीधा है — क्या जनप्रतिनिधि रस्मों से बाहर निकलकर जनता की वास्तविक समस्याओं पर ध्यान देंगे, या फिर हालात ऐसे ही बने रहेंगे?
(मझौली दर्पण न्यूज़)




