जब ₹300 की असली कीमत सोने की किलो में हो… और जनता रोज़ हार रही हो सिस्टम से काग़ज़, कानून और कोर्ट के बीच पिसता आम आदमी
विशेष रिपोर्ट | जनहित में
क्या आपने कभी सोचा है कि ₹300 की असली वैल्यू क्या है?
अगर एक समय में ₹1 = 11.664 ग्राम सोना माना जाए, तो—₹100 = 11,664 ग्राम सोना यानी 1 किलो 1664 ग्राम सोना और अगर यही गणित बड़े पैमाने पर लगाया जाए तो आंकड़े डराने वाले हो जाते हैं।
₹1,78,39,800 × 3 = ₹5,35,19,400 यानी 5 करोड़ 35 लाख 19 हजार 400 रुपए।
यही वह पैसा है, जो मेहनत की कमाई, संपत्ति और भविष्य के नाम पर सिस्टम के भीतर फंसकर जनता से छिन जाता है।
सवाल सीधा है—इतनी लड़ाई के बाद भी जनता क्यों हारती है
सारे काग़ज़ देने के बाद DM, SP, थाना, बैंक, कोर्ट—हर जगह आवेदन लगाने के बाद फिर भी आम आदमी की सुनवाई क्यों नहीं होती?
जवाब कड़वा है, लेकिन सच है—क्योंकि मौजूदा बैंकिंग सिस्टम न्याय के लिए नहीं
वसूली के लिए डिज़ाइन किया गया है।
बैंक जनता के साथ क्या करता है?
1. काग़ज़ लेता है, जवाब नहीं देता बैंक आपसे दर्जनों आवेदन ले लेगा SARFAESI Act की धारा 13(3A) के तहत आपत्ति भी स्वीकार कर लेगा लेकिन कारणयुक्त जवाब कभी नहीं देगा। क्यों? ताकि आप थक जाएँ हिम्मत हारें और चुपचाप झुक जाएँ।
2. DM और पुलिस को ढाल बनाता है
DM सिर्फ़ पोज़ेशन दिलवाता है आपके काग़ज़ वैध हैं या नहीं—यह जाँचने की ज़हमत नहीं उठाता पुलिस FIR से इंकार कर देती है—कहती है “सिविल मामला है”
बैंक जानता है— सिस्टम उसके साथ खड़ा है और आम आदमी अकेला है।
3. कोर्ट में केस होते हुए भी दबाव मामला कोर्ट में चल रहा हो, फिर भी—नोटिस भेजे जाते हैं धमकियाँ दी जाती हैं सामान हटाने के आदेश मानसिक दबाव
मकसद एक— डराओ समझौता कराओ या मामला छोड़ने पर मजबूर करो
4. कानून को हथियार बना दिया गया
SARFAESI Act जनता की सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि बैंकों की रिकवरी मशीन बन चुका है Natural Justice यानी न्याय के सिद्धांत अक्सर काग़ज़ों में ही रह जाते हैं।
फिर जनता की सुनवाई क्यों नहीं होती?
क्योंकि—बैंक = संस्थागत ताकत
जनता = अकेला व्यक्ति और सिस्टम जानता है— 100 में से 90 लोग बीच में ही लड़ाई छोड़ देंगे। लेकिन सच्चाई यह है बैंक भगवान नहीं है बैंक कानून से ऊपर नहीं है बैंक भी जवाबदेह है
बस फर्क इतना है—बैंक तभी जवाब देता है, जब कोर्ट मजबूर करे।
जनता क्या करे? (सबसे ज़रूरी)
सिर्फ़ आवेदन मत लगाइए हर चीज़ का लिखित रिकॉर्ड बनाइए
13(3A) के जवाब न मिलने को सबूत बनाइए
DRT, मजिस्ट्रेट, हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाइए
डरना बंद कीजिए—बैंक इसी डर पर चलता है
याद रखिए
बैंक का सबसे बड़ा हथियार आपकी चुप्पी जनता का सबसे बड़ा हथियार कानून की समझ
यह सवाल अब सिर्फ़ बैंकों का नहीं है—सवाल यह है कि क्या जनता अब भी चुप रहेगी?
जागो जनता | जानो कानून | लड़ो हक़ की लड़ाई
(जनहित में जारी)




