देश में हर साल हजारों करोड़ रुपये का बजट विकास के नाम पर पास होता है। योजनाएं बनती हैं, फाइलें तैयार होती हैं, टेंडर निकलते हैं और कागजों में विकास की लंबी कहानी लिख दी जाती है।
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लेकिन जब आम नागरिक अपने गांव, कस्बे या शहर की सड़कों, नालियों, स्कूलों और अस्पतालों की हालत देखता है, तो एक ही सवाल मन में उठता है—आख़िर ये पैसा जाता कहां है?
सच्चाई यह है कि सरकारी फंड आता जरूर है, लेकिन उसका सही उपयोग हमेशा सवालों के घेरे में रहता है। कई बार योजनाएं सिर्फ कागजों में पूरी दिखा दी जाती हैं, जबकि जमीन पर हालात जस के तस रहते हैं। छोटे से लेकर बड़े विभागों तक, कहीं कमीशनखोरी तो कहीं लापरवाही की शिकायतें सामने आती रहती हैं।
विडंबना यह है कि भ्रष्टाचार के मामलों में अक्सर एक अजीब “एकता” देखने को मिलती है। जहां जनता के हितों की बात आती है वहां मतभेद दिखते हैं, लेकिन जब बड़े घोटालों को दबाने या जिम्मेदारी से बचने की बात होती है, तो कई लोग एकजुट नजर आते हैं।
सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि आम नागरिक सब कुछ समझते हुए भी अक्सर चुप रहना पसंद करता है। लोग डरते हैं कि अगर उन्होंने आवाज उठाई तो कहीं उन्हें ही परेशानियों का सामना न करना पड़े—कभी झूठे केस का डर, कभी प्रशासनिक दबाव का भय।
यही डर कई लोगों के लिए अवसर बन जाता है। जब जनता सवाल नहीं पूछती, तो जवाबदेही भी कमजोर हो जाती है। धीरे-धीरे भ्रष्टाचार की खबरें भी सिर्फ सुर्खियां बनकर रह जाती हैं और समाज मानो इन सबका आदी हो जाता है।
असल बदलाव तब आएगा जब “मैं” की जगह “हम” की सोच मजबूत होगी। जब आम नागरिक अपने अधिकारों के लिए एकजुट होकर सवाल पूछेंगे, पारदर्शिता की मांग करेंगे और व्यवस्था को जवाबदेह बनाएंगे, तभी सरकारी बजट का सही मतलब—जनता का विकास—सच में दिखाई देगा।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत सरकार नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक होते हैं। ✍️




