रिकार्ड में ‘कुछ नहीं’, मैदान में करोड़ों का खेल RTI में जवाब—“जानकारी उपलब्ध नहीं”, फिर हर साल 15-18 लाख की वसूली कैसे?
मझौली (जबलपुर)
नगर परिषद मझौली एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। सूचना का अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारी में परिषद ने साफ कहा कि “साप्ताहिक हाट-बाजार के लिए शासकीय भूमि के आबंटन संबंधी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है”।
लेकिन हैरानी की बात यह है कि जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है—नगर परिषद हर साल इसी हाट-बाजार को 15 से 18 लाख रुपये में ठेके पर देती है, और व्यापारियों से नियमित वसूली भी जारी रहती है।
RTI बनाम हकीकत: बड़ा विरोधाभास
आवेदक सुंदर लाल बर्मन (वार्ड 12, मझौली) ने वर्ष 2023 में RTI के तहत जानकारी मांगी
परिषद का जवाब (2026): “शासकीय भूमि के आबंटन संबंधी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं” वहीं, स्थानीय सूत्रों के अनुसार: हर साल लाखों रुपये में हाट-बाजार का ठेका व्यापारियों से दैनिक/साप्ताहिक वसूली
सवाल उठता है:
जब रिकॉर्ड में भूमि आवंटन की जानकारी ही नहीं है, तो फिर यह वसूली किस आधार पर हो रही है
व्यापारियों पर दोहरी मार
हाट-बाजार में दुकान लगाने वाले छोटे व्यापारियों का आरोप है कि: उनसे नियमित शुल्क लिया जाता है रसीद/पारदर्शिता का अभाव सुविधाएं (पानी, शौचालय, सुरक्षा) नगण्य यानी राजस्व वसूली पूरी, लेकिन सुविधाएं अधूरी!
कानूनी सवाल खड़े
विशेषज्ञों के अनुसार यह मामला कई गंभीर पहलुओं को जन्म देता है: बिना रिकॉर्ड/आवंटन के वसूली = अनियमितता या अवैध वसूली का संकेत
RTI में “जानकारी उपलब्ध नहीं” देना = रिकॉर्ड प्रबंधन में लापरवाही या जानकारी छिपाना शासन को होने वाले राजस्व का संभावित नुकसान
स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि: पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच हो पिछले वर्षों के ठेके और वसूली का ऑडिट कराया जाए दोषी अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई हो
मझौली दर्पण की पड़ताल जारी
यह मामला सिर्फ एक हाट-बाजार का नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही का है।
अगर रिकॉर्ड में कुछ नहीं, तो लाखों का लेन-देन किसके भरोसे?




