तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी का हालिया भाषण संसद और सियासी गलियारों में तीखी बहस का केंद्र बन गया है।
नई दिल्ली
कर व्यवस्था पर उनकी बेबाक टिप्पणी इतनी सशक्त रही कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण* भी बिना प्रतिक्रिया दिए सुनती नजर आईं। अभिषेक बनर्जी ने कहा—भारत में आम आदमी जन्म से लेकर मृत्यु तक टैक्स ही टैक्स देता है।
उन्होंने गिनाया कि देश में व्यक्ति के जीवन का शायद ही कोई ऐसा पड़ाव बचा हो, जहां सरकार टैक्स न वसूलती हो।
बच्चे के जन्म लेते ही—अस्पताल और जरूरी सेवाओं पर टैक्स,
दूध, डायपर—सब पर टैक्स,
पढ़ाई शुरू होते ही—शिक्षा, किताबें, नोटबुक, पेन-पेंसिल पर टैक्स,
मोबाइल और डेटा पर भी टैक्स।
अभिषेक बनर्जी ने आगे कहा कि जब व्यक्ति कमाना शुरू करता है तो **इनकम टैक्स**, बचत पर टैक्स और रोजमर्रा की जिंदगी के हर खर्च पर टैक्स देना पड़ता है। काम पर जाने के लिए पेट्रोल-डीजल पर भारी टैक्स, बीमार होने पर इलाज और दवाइयों तक पर टैक्स—आम आदमी हर कदम पर कर के बोझ तले दबा है।
उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि बुढ़ापे में मिलने वाली पेंशन पर टैक्स, और मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार, शोक सभा में जलने वाली अगरबत्ती तक पर टैक्स—यानी “इंसान इस देश में सांस लेने के लिए भी टैक्स देता है।”
सबसे तीखा सवाल उन्होंने अंत में उठाया—बदले में मिलता क्या है?
मिलावटी खाद्य पदार्थ,
प्रदूषित हवा,
प्रदूषित पानी,
और आम नागरिक के लिए न सुरक्षा, न भरोसा—
सिर्फ टैक्स… टैक्स… और टैक्स।
अभिषेक बनर्जी का यह भाषण सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और आम लोगों की उस पीड़ा को आवाज दे रहा है, जो बढ़ती महंगाई और करों के बोझ से रोज जूझ रहे हैं। अब सवाल यह है कि सरकार इस तीखे आईने में अपनी नीतियों की समीक्षा करेगी या इस आवाज को भी सियासी शोर मानकर नजरअंदाज कर देगी?




