आर्थिक संकट से जूझ चुके श्रीलंका ने जनहित में एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए सांसदों को रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली पेंशन पूरी तरह समाप्त कर दी है।
नई दिल्ली
संसद में 154 मतों के समर्थन से 49 साल पुराने कानून को रद्द कर दिया गया। यह फैसला राजनीति में जवाबदेही और समानता की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
श्रीलंका के इस निर्णय ने भारत में भी एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है—क्या भारत में भी सांसदों और विधायकों को मिलने वाली आजीवन पेंशन व्यवस्था पर पुनर्विचार होना चाहिए
भारत में जहां आम नागरिक को पेंशन के लिए दशकों तक सेवा करनी पड़ती है, वहीं जनप्रतिनिधियों को मात्र एक कार्यकाल के बाद पेंशन, भत्ते और सुविधाएं मिलती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी व्यवस्थाएं लोकतंत्र में समानता के सिद्धांत के विपरीत हैं। श्रीलंका का कदम बताता है कि आर्थिक अनुशासन और नैतिक राजनीति संभव है—बस राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए।




